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गांव से शहर तक पहुंची पढ़ाई, लेकिन समान अवसर अब भी सपना

 
गांव से शहर तक पहुंची पढ़ाई, लेकिन समान अवसर अब भी सपना
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New Delhi : देश में कॉलेज और विश्वविद्यालयों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। नए कोर्स शुरू हुए हैं और शिक्षा का दायरा शहरों से निकलकर कस्बों तक पहुंचा है। इसके बावजूद सवाल बना हुआ है कि क्या हर वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा में समान अवसर मिल पा रहे हैं? आंकड़े बताते हैं कि पहुंच तो बढ़ी है, लेकिन बराबरी अभी भी अधूरी है।

तेजी से बढ़ा उच्च शिक्षा का दायरा

भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र ने पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय विस्तार किया है। 1950 में जहां करीब 500 कॉलेज थे, वहीं अब यह संख्या 50 हजार के पार पहुंच चुकी है। 18 से 23 वर्ष के युवाओं का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) भी 2012 के 16% से बढ़कर 2022 में 28% तक पहुंच गया है।

सामाजिक वर्गों के बीच असमानता

नामांकन में वृद्धि के बावजूद सामाजिक वर्गों के बीच अंतर बना हुआ है। अनुसूचित जाति (SC) छात्रों का GER लगभग 18% से बढ़कर 26% तक पहुंचा है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) में यह 12% से बढ़कर 19% हुआ है। इसके बावजूद ये आंकड़े सामान्य वर्ग और ओबीसी के मुकाबले अभी भी पीछे हैं।

कोर्स चयन में दिखता है आर्थिक फर्क

उच्च शिक्षा में असमानता का एक बड़ा पहलू कोर्स के चयन में भी दिखता है। आर्थिक रूप से मजबूत परिवारों के छात्र इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य प्रोफेशनल कोर्स चुनते हैं, जबकि कम आय वाले परिवारों के छात्र अधिकतर आर्ट्स और कॉमर्स की ओर रुख करते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इंजीनियरिंग की पढ़ाई पर चार साल में औसतन 6 से 8 लाख रुपये तक खर्च आता है, जबकि निजी संस्थानों में यह लागत और ज्यादा हो सकती है। मेडिकल शिक्षा तो इससे भी अधिक महंगी है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए इन कोर्स तक पहुंच मुश्किल हो जाती है।

खर्च बना सबसे बड़ी बाधा

फीस, हॉस्टल, किताबें और शहर में रहने का खर्च गरीब परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बनता है। कई बार छात्र पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं या कम खर्च वाले कोर्स चुनते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं, बल्कि शिक्षा को सस्ता और सुलभ बनाना भी उतना ही जरूरी है।

क्षेत्रीय असमानता भी चिंता का विषय

देश के दक्षिण और पश्चिमी राज्यों में जहां कॉलेजों की संख्या अधिक है, वहीं उत्तर और पूर्वी भारत के कई जिलों में अब भी संस्थानों की कमी है। कुछ जिलों में 10 से भी कम कॉलेज हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में सैकड़ों संस्थान मौजूद हैं।

इसके अलावा, शिक्षक-छात्र अनुपात और बुनियादी सुविधाओं में भी बड़ा अंतर देखने को मिलता है। बेहतर संसाधनों वाले संस्थानों में छात्रों को अधिक अवसर मिलते हैं, जबकि अन्य जगहों पर सीमित संसाधनों में पढ़ाई करनी पड़ती है।