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भारतीय साहित्य की आत्मा संवेदनाओं में बसती है : प्रो. आनन्द कुमार त्यागी

 
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वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान तथा डॉ. शंभूनाथ शोध संस्थापन एवं सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि और नवगीत आंदोलन के अग्रदूत डॉ. शंभूनाथ सिंह की 110वीं जयंती पर बुधवार को संगोष्ठी एवं “डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार समारोह” का आयोजन किया गया।

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डॉ. भगवान दास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित कार्यक्रम का विषय “भारतीय काव्य परंपरा, नवगीत और शंभूनाथ सिंह” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने की।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. त्यागी ने कहा कि कविता ऊर्जा का ऐसा स्वरूप है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि उसका रूपांतरण होता रहता है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल आत्मा संवेदनाओं, भावनाओं और मानवीय मूल्यों में निहित है। छंद कविता को वही शक्ति प्रदान करता है जो किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) करता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी प्रभावों के बावजूद भारतीय काव्य परंपरा में छंदों ने कविता को नया आयाम दिया है।

मुख्य अतिथि एवं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि कवि होना साधारण बात नहीं है और कविता रचना उससे भी अधिक कठिन साधना है। उन्होंने डॉ. शंभूनाथ सिंह को हिंदी कविता का महान साधक बताते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी काव्य को नई दिशा और नया स्वरूप प्रदान किया।

विशिष्ट अतिथि नवगीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय साहित्य की जड़ें छंद पर आधारित रही हैं। उन्होंने कहा कि नवगीत पर गंभीर कार्य और संग्रह तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों में काशी विद्यापीठ का विशेष स्थान है।

वरिष्ठ कथाकार डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि कविता के विशाल कैनवास पर नवगीत एक चमकदार रंग की तरह है, जो भाव, रस और विवेक को अभिव्यक्ति देता है। वहीं विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि नवगीत की परंपरा वैदिक ऋचाओं से जुड़ी हुई है और जब तक गीत जीवित है, कविता का अस्तित्व भी बना रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान इस वर्ष का “डॉ. शंभुनाथ सिंह स्मृति नवगीत पुरस्कार” लखनऊ के वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. रविशंकर पाण्डेय की कृति ‘समय से रहती ठनी’ तथा प्रयागराज के यश मालवीय की कृति ‘काशी नहीं जुलाहे की’ को प्रदान किया गया।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रो. उमेश प्रसाद सिंह, प्रो. रामसुधार सिंह, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, प्रो. वन्दना मिश्र, प्रो. रेनू सिंह, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप और पुरुषार्थ सिंह समेत अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के अंतिम चरण “नवगीत दुपहरिया” में संस्कृति मिश्रा, यश मालवीय, डॉ. अशोक सिंह, ओम धीरज, हिमांशु उपाध्याय, शिव कुमार गुप्त ‘पराग’, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. इन्दीवर और सुरेन्द्र वाजपेयी ने काव्यपाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम में स्वागत भाषण हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सृजन पीठ के प्रभारी प्रो. अनुराग कुमार ने किया। बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और साहित्य प्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान तथा डॉ. शंभूनाथ शोध संस्थापन एवं सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि और नवगीत आंदोलन के अग्रदूत डॉ. शंभूनाथ सिंह की 110वीं जयंती पर बुधवार को संगोष्ठी एवं “डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार समारोह” का आयोजन किया गया।

डॉ. भगवान दास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित कार्यक्रम का विषय “भारतीय काव्य परंपरा, नवगीत और शंभूनाथ सिंह” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने की।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. त्यागी ने कहा कि कविता ऊर्जा का ऐसा स्वरूप है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि उसका रूपांतरण होता रहता है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल आत्मा संवेदनाओं, भावनाओं और मानवीय मूल्यों में निहित है। छंद कविता को वही शक्ति प्रदान करता है जो किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) करता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी प्रभावों के बावजूद भारतीय काव्य परंपरा में छंदों ने कविता को नया आयाम दिया है।

मुख्य अतिथि एवं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि कवि होना साधारण बात नहीं है और कविता रचना उससे भी अधिक कठिन साधना है। उन्होंने डॉ. शंभूनाथ सिंह को हिंदी कविता का महान साधक बताते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी काव्य को नई दिशा और नया स्वरूप प्रदान किया।

विशिष्ट अतिथि नवगीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय साहित्य की जड़ें छंद पर आधारित रही हैं। उन्होंने कहा कि नवगीत पर गंभीर कार्य और संग्रह तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों में काशी विद्यापीठ का विशेष स्थान है।

वरिष्ठ कथाकार डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि कविता के विशाल कैनवास पर नवगीत एक चमकदार रंग की तरह है, जो भाव, रस और विवेक को अभिव्यक्ति देता है। वहीं विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि नवगीत की परंपरा वैदिक ऋचाओं से जुड़ी हुई है और जब तक गीत जीवित है, कविता का अस्तित्व भी बना रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान इस वर्ष का “डॉ. शंभुनाथ सिंह स्मृति नवगीत पुरस्कार” लखनऊ के वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. रविशंकर पाण्डेय की कृति ‘समय से रहती ठनी’ तथा प्रयागराज के यश मालवीय की कृति ‘काशी नहीं जुलाहे की’ को प्रदान किया गया।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रो. उमेश प्रसाद सिंह, प्रो. रामसुधार सिंह, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, प्रो. वन्दना मिश्र, प्रो. रेनू सिंह, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप और पुरुषार्थ सिंह समेत अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के अंतिम चरण “नवगीत दुपहरिया” में संस्कृति मिश्रा, यश मालवीय, डॉ. अशोक सिंह, ओम धीरज, हिमांशु उपाध्याय, शिव कुमार गुप्त ‘पराग’, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. इन्दीवर और सुरेन्द्र वाजपेयी ने काव्यपाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम में स्वागत भाषण हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सृजन पीठ के प्रभारी प्रो. अनुराग कुमार ने किया। बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और साहित्य प्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान तथा डॉ. शंभूनाथ शोध संस्थापन एवं सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि और नवगीत आंदोलन के अग्रदूत डॉ. शंभूनाथ सिंह की 110वीं जयंती पर बुधवार को संगोष्ठी एवं “डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार समारोह” का आयोजन किया गया।

डॉ. भगवान दास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित कार्यक्रम का विषय “भारतीय काव्य परंपरा, नवगीत और शंभूनाथ सिंह” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने की।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. त्यागी ने कहा कि कविता ऊर्जा का ऐसा स्वरूप है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि उसका रूपांतरण होता रहता है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल आत्मा संवेदनाओं, भावनाओं और मानवीय मूल्यों में निहित है। छंद कविता को वही शक्ति प्रदान करता है जो किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) करता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी प्रभावों के बावजूद भारतीय काव्य परंपरा में छंदों ने कविता को नया आयाम दिया है।

मुख्य अतिथि एवं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि कवि होना साधारण बात नहीं है और कविता रचना उससे भी अधिक कठिन साधना है। उन्होंने डॉ. शंभूनाथ सिंह को हिंदी कविता का महान साधक बताते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी काव्य को नई दिशा और नया स्वरूप प्रदान किया।

विशिष्ट अतिथि नवगीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय साहित्य की जड़ें छंद पर आधारित रही हैं। उन्होंने कहा कि नवगीत पर गंभीर कार्य और संग्रह तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों में काशी विद्यापीठ का विशेष स्थान है।

वरिष्ठ कथाकार डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि कविता के विशाल कैनवास पर नवगीत एक चमकदार रंग की तरह है, जो भाव, रस और विवेक को अभिव्यक्ति देता है। वहीं विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि नवगीत की परंपरा वैदिक ऋचाओं से जुड़ी हुई है और जब तक गीत जीवित है, कविता का अस्तित्व भी बना रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान इस वर्ष का “डॉ. शंभुनाथ सिंह स्मृति नवगीत पुरस्कार” लखनऊ के वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. रविशंकर पाण्डेय की कृति ‘समय से रहती ठनी’ तथा प्रयागराज के यश मालवीय की कृति ‘काशी नहीं जुलाहे की’ को प्रदान किया गया।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रो. उमेश प्रसाद सिंह, प्रो. रामसुधार सिंह, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, प्रो. वन्दना मिश्र, प्रो. रेनू सिंह, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप और पुरुषार्थ सिंह समेत अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के अंतिम चरण “नवगीत दुपहरिया” में संस्कृति मिश्रा, यश मालवीय, डॉ. अशोक सिंह, ओम धीरज, हिमांशु उपाध्याय, शिव कुमार गुप्त ‘पराग’, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. इन्दीवर और सुरेन्द्र वाजपेयी ने काव्यपाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम में स्वागत भाषण हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सृजन पीठ के प्रभारी प्रो. अनुराग कुमार ने किया। बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और साहित्य प्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान तथा डॉ. शंभूनाथ शोध संस्थापन एवं सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि और नवगीत आंदोलन के अग्रदूत डॉ. शंभूनाथ सिंह की 110वीं जयंती पर बुधवार को संगोष्ठी एवं “डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार समारोह” का आयोजन किया गया।

डॉ. भगवान दास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित कार्यक्रम का विषय “भारतीय काव्य परंपरा, नवगीत और शंभूनाथ सिंह” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने की।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. त्यागी ने कहा कि कविता ऊर्जा का ऐसा स्वरूप है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि उसका रूपांतरण होता रहता है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल आत्मा संवेदनाओं, भावनाओं और मानवीय मूल्यों में निहित है। छंद कविता को वही शक्ति प्रदान करता है जो किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) करता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी प्रभावों के बावजूद भारतीय काव्य परंपरा में छंदों ने कविता को नया आयाम दिया है।

मुख्य अतिथि एवं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि कवि होना साधारण बात नहीं है और कविता रचना उससे भी अधिक कठिन साधना है। उन्होंने डॉ. शंभूनाथ सिंह को हिंदी कविता का महान साधक बताते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी काव्य को नई दिशा और नया स्वरूप प्रदान किया।

विशिष्ट अतिथि नवगीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय साहित्य की जड़ें छंद पर आधारित रही हैं। उन्होंने कहा कि नवगीत पर गंभीर कार्य और संग्रह तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों में काशी विद्यापीठ का विशेष स्थान है।

वरिष्ठ कथाकार डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि कविता के विशाल कैनवास पर नवगीत एक चमकदार रंग की तरह है, जो भाव, रस और विवेक को अभिव्यक्ति देता है। वहीं विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि नवगीत की परंपरा वैदिक ऋचाओं से जुड़ी हुई है और जब तक गीत जीवित है, कविता का अस्तित्व भी बना रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान इस वर्ष का “डॉ. शंभुनाथ सिंह स्मृति नवगीत पुरस्कार” लखनऊ के वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. रविशंकर पाण्डेय की कृति ‘समय से रहती ठनी’ तथा प्रयागराज के यश मालवीय की कृति ‘काशी नहीं जुलाहे की’ को प्रदान किया गया।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रो. उमेश प्रसाद सिंह, प्रो. रामसुधार सिंह, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, प्रो. वन्दना मिश्र, प्रो. रेनू सिंह, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप और पुरुषार्थ सिंह समेत अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के अंतिम चरण “नवगीत दुपहरिया” में संस्कृति मिश्रा, यश मालवीय, डॉ. अशोक सिंह, ओम धीरज, हिमांशु उपाध्याय, शिव कुमार गुप्त ‘पराग’, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. इन्दीवर और सुरेन्द्र वाजपेयी ने काव्यपाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम में स्वागत भाषण हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सृजन पीठ के प्रभारी प्रो. अनुराग कुमार ने किया। बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और साहित्य प्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान तथा डॉ. शंभूनाथ शोध संस्थापन एवं सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि और नवगीत आंदोलन के अग्रदूत डॉ. शंभूनाथ सिंह की 110वीं जयंती पर बुधवार को संगोष्ठी एवं “डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार समारोह” का आयोजन किया गया।

डॉ. भगवान दास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित कार्यक्रम का विषय “भारतीय काव्य परंपरा, नवगीत और शंभूनाथ सिंह” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने की।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. त्यागी ने कहा कि कविता ऊर्जा का ऐसा स्वरूप है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि उसका रूपांतरण होता रहता है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल आत्मा संवेदनाओं, भावनाओं और मानवीय मूल्यों में निहित है। छंद कविता को वही शक्ति प्रदान करता है जो किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) करता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी प्रभावों के बावजूद भारतीय काव्य परंपरा में छंदों ने कविता को नया आयाम दिया है।

मुख्य अतिथि एवं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि कवि होना साधारण बात नहीं है और कविता रचना उससे भी अधिक कठिन साधना है। उन्होंने डॉ. शंभूनाथ सिंह को हिंदी कविता का महान साधक बताते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी काव्य को नई दिशा और नया स्वरूप प्रदान किया।

विशिष्ट अतिथि नवगीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय साहित्य की जड़ें छंद पर आधारित रही हैं। उन्होंने कहा कि नवगीत पर गंभीर कार्य और संग्रह तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों में काशी विद्यापीठ का विशेष स्थान है।

वरिष्ठ कथाकार डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि कविता के विशाल कैनवास पर नवगीत एक चमकदार रंग की तरह है, जो भाव, रस और विवेक को अभिव्यक्ति देता है। वहीं विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि नवगीत की परंपरा वैदिक ऋचाओं से जुड़ी हुई है और जब तक गीत जीवित है, कविता का अस्तित्व भी बना रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान इस वर्ष का “डॉ. शंभुनाथ सिंह स्मृति नवगीत पुरस्कार” लखनऊ के वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. रविशंकर पाण्डेय की कृति ‘समय से रहती ठनी’ तथा प्रयागराज के यश मालवीय की कृति ‘काशी नहीं जुलाहे की’ को प्रदान किया गया।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रो. उमेश प्रसाद सिंह, प्रो. रामसुधार सिंह, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, प्रो. वन्दना मिश्र, प्रो. रेनू सिंह, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप और पुरुषार्थ सिंह समेत अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के अंतिम चरण “नवगीत दुपहरिया” में संस्कृति मिश्रा, यश मालवीय, डॉ. अशोक सिंह, ओम धीरज, हिमांशु उपाध्याय, शिव कुमार गुप्त ‘पराग’, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. इन्दीवर और सुरेन्द्र वाजपेयी ने काव्यपाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम में स्वागत भाषण हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सृजन पीठ के प्रभारी प्रो. अनुराग कुमार ने किया। बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और साहित्य प्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

वाराणसी। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के महामना मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान तथा डॉ. शंभूनाथ शोध संस्थापन एवं सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि और नवगीत आंदोलन के अग्रदूत डॉ. शंभूनाथ सिंह की 110वीं जयंती पर बुधवार को संगोष्ठी एवं “डॉ. शंभुनाथ सिंह नवगीत पुरस्कार समारोह” का आयोजन किया गया।

डॉ. भगवान दास केंद्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में आयोजित कार्यक्रम का विषय “भारतीय काव्य परंपरा, नवगीत और शंभूनाथ सिंह” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने की।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. त्यागी ने कहा कि कविता ऊर्जा का ऐसा स्वरूप है जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि उसका रूपांतरण होता रहता है। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल आत्मा संवेदनाओं, भावनाओं और मानवीय मूल्यों में निहित है। छंद कविता को वही शक्ति प्रदान करता है जो किसी रासायनिक प्रक्रिया में उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) करता है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी प्रभावों के बावजूद भारतीय काव्य परंपरा में छंदों ने कविता को नया आयाम दिया है।

मुख्य अतिथि एवं उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि कवि होना साधारण बात नहीं है और कविता रचना उससे भी अधिक कठिन साधना है। उन्होंने डॉ. शंभूनाथ सिंह को हिंदी कविता का महान साधक बताते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी काव्य को नई दिशा और नया स्वरूप प्रदान किया।

विशिष्ट अतिथि नवगीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि भारतीय साहित्य की जड़ें छंद पर आधारित रही हैं। उन्होंने कहा कि नवगीत पर गंभीर कार्य और संग्रह तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों में काशी विद्यापीठ का विशेष स्थान है।

वरिष्ठ कथाकार डॉ. नीरजा माधव ने कहा कि कविता के विशाल कैनवास पर नवगीत एक चमकदार रंग की तरह है, जो भाव, रस और विवेक को अभिव्यक्ति देता है। वहीं विद्याश्री न्यास के अध्यक्ष डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि नवगीत की परंपरा वैदिक ऋचाओं से जुड़ी हुई है और जब तक गीत जीवित है, कविता का अस्तित्व भी बना रहेगा।

कार्यक्रम के दौरान इस वर्ष का “डॉ. शंभुनाथ सिंह स्मृति नवगीत पुरस्कार” लखनऊ के वरिष्ठ नवगीतकार डॉ. रविशंकर पाण्डेय की कृति ‘समय से रहती ठनी’ तथा प्रयागराज के यश मालवीय की कृति ‘काशी नहीं जुलाहे की’ को प्रदान किया गया।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में प्रो. उमेश प्रसाद सिंह, प्रो. रामसुधार सिंह, प्रो. ओमप्रकाश सिंह, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, प्रो. वन्दना मिश्र, प्रो. रेनू सिंह, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप और पुरुषार्थ सिंह समेत अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के अंतिम चरण “नवगीत दुपहरिया” में संस्कृति मिश्रा, यश मालवीय, डॉ. अशोक सिंह, ओम धीरज, हिमांशु उपाध्याय, शिव कुमार गुप्त ‘पराग’, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, डॉ. इन्दीवर और सुरेन्द्र वाजपेयी ने काव्यपाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम में स्वागत भाषण हिन्दी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह ने दिया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन सृजन पीठ के प्रभारी प्रो. अनुराग कुमार ने किया। बड़ी संख्या में साहित्यकार, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं और साहित्य प्रेमी कार्यक्रम में उपस्थित रहे।