बलूचिस्तान की निर्वासित सरकार ने पाक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के खिलाफ जारी किया गिरफ्तारी वारंट
New Delhi/Islamabad : जनवरी 2026 में एक बड़ा और विवादास्पद घटनाक्रम सामने आया है। बलूचिस्तान की निर्वासित सरकार, जिसे बलूचिस्तान गणराज्य कहा जा रहा है, ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का दावा किया है। यह वारंट किसी पाकिस्तानी अदालत या सरकार की ओर से नहीं, बल्कि बलूचिस्तान के स्वतंत्रता समर्थक संगठनों की ओर से जारी किया गया है। इस संबंध में घोषणा बलूच एक्टिविस्ट और स्वतंत्रता समर्थक मीर यार बलूच ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर की।
क्या हैं शहबाज शरीफ पर आरोप
मीर यार बलूच के अनुसार, शहबाज शरीफ पर बलूचिस्तान से जुड़े कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इनमें
- बलूचिस्तान के वीजा और आव्रजन नियमों का उल्लंघन,
- वैध वीजा या कानूनी अनुमति के बिना बलूचिस्तान में प्रवेश,
- बलूचिस्तान की संप्रभुता को जानबूझकर नुकसान पहुंचाना,
- क्षेत्रीय अखंडता और हवाई क्षेत्र का गंभीर उल्लंघन शामिल हैं।
उन्होंने दावा किया कि बलूचिस्तान एक अलग, स्वतंत्र और संप्रभु राज्य है और वहां के कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे वह पाकिस्तान का प्रधानमंत्री ही क्यों न हो।
गिरफ्तारी को लेकर क्या कहा गया
जारी किए गए कथित वारंट में कहा गया है कि यदि शहबाज शरीफ बलूचिस्तान के किसी भी हवाई अड्डे या किसी भी एंट्री-एग्जिट पॉइंट पर पहुंचते हैं, तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। यह कार्रवाई बलूचिस्तान गणराज्य के कानूनों और संप्रभु अधिकारों के तहत बताए जाने का दावा किया गया है।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया नहीं
इस पूरे घटनाक्रम पर अब तक पाकिस्तान सरकार या प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह वारंट प्रतीकात्मक है, क्योंकि बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा है और निर्वासित सरकार का वहां कोई वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है।
अलगाववादी आंदोलन की पृष्ठभूमि
यह घटनाक्रम बलूचिस्तान में लंबे समय से चल रहे अलगाववादी आंदोलन को उजागर करता है, जहां पाकिस्तान से अलग होने की मांग की जाती रही है। बताया जा रहा है कि यह वारंट पाकिस्तानी नेतृत्व, सेना और अधिकारियों के लिए एक चेतावनी के रूप में जारी किया गया है कि बिना अनुमति बलूचिस्तान में प्रवेश को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
फिलहाल यह मामला अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और आव्रजन नियमों से जुड़ा एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गया है, जिस पर आगे की घटनाओं को लेकर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
