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युद्ध के 5वें हफ्ते में अमेरिका पर दबाव, ईरान के पलटवार से बिगड़े हालात

 
युद्ध के 5वें हफ्ते में अमेरिका पर दबाव, ईरान के पलटवार से बिगड़े हालात
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Washington/Tehran : मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच अमेरिका की स्थिति लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। युद्ध के पांचवें सप्ताह में प्रवेश कर चुके इस संघर्ष में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं, जबकि ईरान की जवाबी कार्रवाइयों ने हालात और जटिल बना दिए हैं।

रणनीतिक मोर्चों पर बढ़ा दबाव

विश्लेषकों के अनुसार, ईरान ने तीन प्रमुख कदमों के जरिए अमेरिका पर दबाव बनाया है। इसमें Strait of Hormuz को बंद करना, खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाना और अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना शामिल है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है।

सहयोगी देशों ने बनाई दूरी

इस युद्ध में अमेरिका को अपने पारंपरिक सहयोगियों का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया है। यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, इटली और स्पेन जैसे देशों ने सैन्य भागीदारी से दूरी बनाई है, जिससे अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति कमजोर हुई है।

बढ़ता आर्थिक बोझ

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका इस युद्ध में रोजाना करीब 1 अरब डॉलर खर्च कर रहा है। इसके साथ ही मिसाइल भंडार में कमी भी चिंता का विषय बन गई है, जिससे लंबे समय तक युद्ध जारी रखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।

खाड़ी देशों में बढ़ी चिंता

संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत जैसे देशों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। इन देशों को ईरान की संभावित जवाबी कार्रवाई और ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने का खतरा सता रहा है।

अमेरिकी ठिकानों पर हमले

ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी एयरबेस को निशाना बनाते हुए हमले तेज कर दिए हैं। अल उदीद एयर बेस और अल धफरा एयर बेस सहित कई ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिनमें कुछ अमेरिकी सैनिकों के घायल होने की सूचना है।

ट्रंप का सख्त रुख

इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पष्ट किया है कि “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” जारी रहेगा और अमेरिका अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने ईरान के खिलाफ और कड़े हमलों की चेतावनी भी दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में यह संघर्ष लंबा खिंच सकता है। एक ओर ईरान पीछे हटने को तैयार नहीं है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका पर बढ़ता आर्थिक और रणनीतिक दबाव उसे अपनी नीति पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर सकता है।