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सऊदी अरब ने अमेरिका को दिखाया ठेंगा! ट्रंप की ‘Project Freedom’ योजना क्यों हुई फेल?

ईरान संकट और हॉर्मुज जलडमरूमध्य विवाद के बीच सऊदी अरब ने अमेरिका की ‘Project Freedom’ योजना को ठुकरा दिया। पूर्व सऊदी खुफिया प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने दावा किया कि नेतन्याहू ईरान और सऊदी अरब के बीच युद्ध भड़काना चाहते थे। इस खुलासे से पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल मच गई।

 
Saudi Arabia Iran Conflict
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ईरान और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब ने ऐसा रुख अपनाया है जिसने वैश्विक राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। लंबे समय तक अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी माने जाने वाले सऊदी अरब ने इस बार व्हाइट हाउस की रणनीति से दूरी बना ली। सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब सऊदी शाही परिवार के सदस्य और पूर्व खुफिया प्रमुख प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की आक्रामक रणनीति दरअसल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सोची-समझी योजना थी।

उन्होंने आरोप लगाया कि नेतन्याहू लगातार सऊदी अरब और ईरान के बीच सीधा संघर्ष भड़काने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन रियाद ने इस “जाल” में फंसने से इनकार कर दिया।

‘Project Freedom’ पर सऊदी ने अमेरिका को दिया झटका

हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते संकट के बीच अमेरिका ने ‘Project Freedom’ नाम से एक सैन्य योजना तैयार की थी। इसका उद्देश्य तेल टैंकरों को सैन्य सुरक्षा देकर सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराना था। लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, सऊदी अरब ने अमेरिका को अपने एयरबेस और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

बताया जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतिम समय में क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बातचीत कर सऊदी को मनाने की कोशिश की, लेकिन रियाद अपने फैसले पर कायम रहा। इसके बाद अमेरिका को यह योजना टालनी पड़ी।

‘यह नेतन्याहू की जंग थी’

प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने अपने लेख और इंटरव्यू में साफ कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध को लेकर सऊदी अरब शुरू से सतर्क था। उन्होंने CNN से बातचीत में कहा, “यह नेतन्याहू की जंग थी। उन्होंने किसी तरह ट्रंप को अपने विचारों के समर्थन के लिए मना लिया।”

उन्होंने यह भी कहा कि जब क्षेत्र के कुछ पक्ष सऊदी अरब को “विनाश की आग” में धकेलना चाहते थे, तब सऊदी नेतृत्व ने संयम का रास्ता चुना। उनका कहना था कि यदि सऊदी ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता तो उसके बदले में सऊदी तेल ठिकानों और महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े हमले हो सकते थे।

हॉर्मुज संकट क्यों बना वैश्विक चिंता?

हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक माना जाता है। यहां तनाव बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई। तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होने से कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा।

सऊदी अरब को डर था कि यदि अमेरिका की सैन्य योजना लागू होती है तो यमन के हूती विद्रोही भी युद्ध में सक्रिय हो सकते हैं। इससे लाल सागर के बाब-अल-मंदेब मार्ग पर भी संकट खड़ा हो सकता था। यह स्थिति सऊदी अर्थव्यवस्था के लिए और ज्यादा खतरनाक साबित होती।

UAE और सऊदी अरब के रिश्तों में बढ़ी खटास

जहां सऊदी अरब ने अमेरिका के सैन्य मिशन से दूरी बनाई, वहीं संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने अपेक्षाकृत आक्रामक रुख अपनाया। रिपोर्ट्स के अनुसार UAE इस योजना के समर्थन में था और बाद में ईरान के हमलों का भी सामना करना पड़ा।

विश्लेषकों का मानना है कि इस मुद्दे ने सऊदी अरब और UAE के बीच पहले से मौजूद मतभेदों को और बढ़ा दिया है। दोनों देशों के बीच यमन, सूडान और सोमालिया को लेकर पहले से तनाव बना हुआ है। अब हॉर्मुज संकट ने रिश्तों को और जटिल बना दिया है।

‘अमेरिका और इजरायल अब बड़ा खतरा’

प्रिंस तुर्की के बयान का सबसे बड़ा संदेश यह माना जा रहा है कि सऊदी अरब अब क्षेत्रीय राजनीति में खुद को नए तरीके से स्थापित करना चाहता है। उन्होंने ईरान को “परेशानी पैदा करने वाला पड़ोसी” जरूर बताया, लेकिन साथ ही यह भी संकेत दिया कि अमेरिका और इजरायल की रणनीतियां क्षेत्र के लिए और अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सऊदी अरब अब संतुलन की नीति अपनाते हुए खुद को सीधे युद्ध से दूर रखना चाहता है। यही वजह है कि रियाद ने इस बार अमेरिका और इजरायल के सैन्य एजेंडे का खुलकर समर्थन नहीं किया।

बदलते समीकरणों का बड़ा संकेत

पश्चिम एशिया में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच सऊदी अरब का यह रुख बेहद अहम माना जा रहा है। एक समय अमेरिका के सबसे मजबूत सहयोगी रहे रियाद का अब खुलकर रणनीतिक दूरी बनाना यह संकेत देता है कि खाड़ी देशों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में ईरान, सऊदी अरब, अमेरिका और इजरायल के बीच शक्ति संतुलन की नई राजनीति देखने को मिल सकती है।