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ट्रंप को कोर्ट का झटका, सरकारी पैसे से चल रहे टीवी विज्ञापनों पर रोक

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को सरकारी धन से चल रहे टीवी विज्ञापनों के मामले में अदालत से झटका लगा है। न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने विज्ञापनों पर दो सप्ताह की अस्थायी रोक लगाई है। जानिए 2 करोड़ डॉलर के खर्च, राजनीतिक प्रचार के आरोप और व्हाइट हाउस की दलील से जुड़ी पूरी जानकारी।

 
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को सरकारी धन से प्रसारित टीवी विज्ञापनों के मामले में अदालत से झटका लगा है। न्यूयॉर्क की संघीय अदालत ने ट्रंप के राजनीतिक संदेशों को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों को रोकने का आदेश दिया है। इन विज्ञापनों पर सरकारी खजाने से लाखों डॉलर खर्च किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी देने के बजाय इन विज्ञापनों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए किया जा रहा था।

अदालत ने दो सप्ताह के लिए लगाई रोक

अमेरिकी जिला न्यायाधीश जेनिफर रोचॉन ने रविवार रात ट्रंप प्रशासन को निर्देश दिया कि वह ऐसे विज्ञापनों को प्रसारित करने से रोके। अदालत का अस्थायी प्रतिबंधात्मक आदेश दो सप्ताह तक प्रभावी रहेगा। इस दौरान प्रशासन को विवादित विज्ञापनों के निर्माण, प्रसारण और उनसे जुड़े नए समझौतों को आगे बढ़ाने से भी रोका गया है।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब अमेरिका में 3 नवंबर को मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन विज्ञापनों के जरिए रिपब्लिकन उम्मीदवारों को राजनीतिक लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी।

विज्ञापनों पर खर्च हुए 2 करोड़ डॉलर

एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने इन विज्ञापनों के लिए करदाताओं के पैसों से 2 करोड़ डॉलर यानी करीब 20 मिलियन डॉलर आवंटित किए थे। विज्ञापनों का प्रसारण सितंबर के आखिरी सप्ताह में शुरू हुआ था।

इन विज्ञापनों में राष्ट्रपति ट्रंप के राजनीतिक संदेशों और उनकी नीतियों को प्रमुखता दी गई थी। कुछ विज्ञापनों में कम्युनिज्म के खतरे को लेकर ट्रंप की टिप्पणियां दिखाई गईं, जबकि एक अन्य विज्ञापन में उनके पिछले राष्ट्रपति चुनाव अभियान की सामग्री का इस्तेमाल किया गया। एक विज्ञापन में वेनेजुएला के नेता निकोलस मादुरो को पकड़े जाने से जुड़ी अमेरिकी प्रशासन की कार्रवाई पर भी ध्यान केंद्रित किया गया था।

विज्ञापनों को लेकर विवाद बढ़ने के बाद सरकारी धन के इस्तेमाल पर सवाल उठने लगे। आलोचकों का कहना था कि इन विज्ञापनों से जनता को किसी खास सरकारी योजना का लाभ लेने की जानकारी नहीं मिल रही थी, बल्कि राष्ट्रपति की राजनीतिक छवि को बढ़ावा दिया जा रहा था।

ट्रंप प्रशासन ने क्या दी दलील?

ट्रंप प्रशासन ने विज्ञापनों का बचाव करते हुए उन्हें जनहित से जुड़ा प्रचार बताया था। व्हाइट हाउस का तर्क था कि सरकारें अपनी नीतियों और कामकाज के बारे में लोगों को जानकारी देने के लिए पहले भी विज्ञापन जारी करती रही हैं।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इस दलील पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि सरकारी धन का इस्तेमाल किसी राष्ट्रपति के राजनीतिक संदेश को बढ़ावा देने या चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग की एक वरिष्ठ अधिकारी ने अदालत में दाखिल दस्तावेज में बताया था कि विज्ञापनों के लिए इस्तेमाल की गई रकम कांग्रेस की ओर से स्वीकृत धन से आई थी। यह राशि सीमा सुरक्षा से जुड़ी गतिविधियों और आयोजनों को बढ़ावा देने सहित अन्य कार्यों के लिए उपलब्ध कराई गई थी।

कॉमन कॉज समेत कई पक्षों ने दायर की याचिका

गैर-दलीय निगरानी संगठन कॉमन कॉज समेत कई पक्षों ने विज्ञापनों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं में एक सार्वजनिक कर्मचारी संघ और अलबामा राज्य के प्रतिनिधि पद के उम्मीदवार भी शामिल थे।

उनका आरोप है कि विज्ञापनों के जरिए सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए किया गया। डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी ने भी इस मामले में अलग से मुकदमा दायर किया है।

कॉमन कॉज ने अदालत के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि सरकारी धन का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचार के लिए नहीं होना चाहिए। संगठन का कहना है कि किसी भी पार्टी का राष्ट्रपति सरकारी पैसे का दुरुपयोग नहीं कर सकता।

अब विज्ञापनों का खर्च कौन उठाएगा?

विवाद बढ़ने के बाद ट्रंप ने कहा था कि आगे इन विज्ञापनों का खर्च करदाताओं के पैसे से नहीं उठाया जाएगा। व्हाइट हाउस के मुताबिक, भविष्य में विज्ञापनों के लिए राष्ट्रपति की राजनीतिक कार्रवाई समिति (MAGA PAC) धन उपलब्ध कराएगी।

हालांकि, प्रशासन ने पहले प्रसारित हो चुके विज्ञापनों पर खर्च की गई सरकारी रकम की भरपाई करने की तत्काल कोई योजना नहीं बताई थी। ऐसे में विवाद का एक प्रमुख मुद्दा यह भी है कि पहले खर्च किए गए सार्वजनिक धन की जिम्मेदारी किसकी होगी।

फिलहाल अदालत का आदेश विवादित विज्ञापनों पर अस्थायी रोक लगाता है। मामले में आगे की कानूनी कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि सरकारी धन से ऐसे राजनीतिक संदेशों का प्रसारण किन शर्तों के तहत किया जा सकता है।