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रूस से तेल खरीदने पर भारत को धमकाते रहे ट्रंप, अब खुद पुतिन से डीजल खरीदने का ऐलान

डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल खरीदने के समझौते का ऐलान किया है, जबकि अमेरिका रूसी तेल खरीदने पर भारत पर टैरिफ का दबाव बनाता रहा है। इस फैसले से अमेरिकी नीति में दोहरे मापदंडों की बहस तेज हो गई है। जानिए समझौते की पूरी जानकारी और भारत पर इसका संभावित असर।

 
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नई दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत के बाद रूस से डीजल खरीदने का ऐलान किया है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब अमेरिका रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत पर टैरिफ लगाने और आर्थिक दबाव बनाने की नीति अपनाता रहा है। ऐसे में ट्रंप के इस कदम ने अमेरिकी ऊर्जा नीति की निरंतरता और भारत के साथ उसके व्यापारिक रवैये पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ट्रंप के मुताबिक, रूस अमेरिका और वैश्विक बाजारों को तुरंत तीन लाख मीट्रिक टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा। इसके बाद नवंबर में पांच लाख मीट्रिक टन और आगे दस लाख मीट्रिक टन की आपूर्ति की योजना है। इस समझौते को लेकर यूक्रेन ने नाराजगी जताई है, जबकि ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि इससे ईंधन की कीमतों में लंबे समय तक बड़ी गिरावट की गारंटी नहीं है।

रूस से तेल खरीदने पर भारत पर दबाव, अब अमेरिका खुद करेगा आयात

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई थी। भारत का तर्क रहा है कि दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल होने के कारण उसे अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था के हित में किफायती तथा भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करनी होती है।

दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाया और भारत पर अतिरिक्त टैरिफ भी लगाए। अमेरिकी पक्ष का तर्क रहा कि रूसी ऊर्जा की खरीद से मॉस्को को युद्ध के लिए आर्थिक संसाधन मिलते हैं।

अब रूस से डीजल खरीदने की अमेरिकी घोषणा ने इसी नीति को लेकर सवाल खड़े किए हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि रूस से ऊर्जा खरीदने से उसकी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचता है, तो अमेरिका अपने हित में ऐसा समझौता कैसे कर सकता है, जबकि भारत को इसी मुद्दे पर आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा है?

हालांकि, कच्चे तेल और डीजल के आयात की परिस्थितियां, मात्रा और नियामकीय शर्तें अलग हो सकती हैं। इसलिए दोनों मामलों की तुलना करते समय इन पहलुओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

ट्रंप-पुतिन के बीच क्या हुआ समझौता?

ट्रंप ने 9 अक्टूबर को पुतिन से बातचीत के बाद रूसी डीजल की आपूर्ति का ऐलान किया। उनके अनुसार, शुरुआती खेप में तीन लाख मीट्रिक टन से अधिक डीजल अमेरिका और वैश्विक बाजारों में पहुंचेगा। इसके बाद नवंबर में पांच लाख मीट्रिक टन और आगे दस लाख मीट्रिक टन की आपूर्ति की बात कही गई है। ट्रंप ने भविष्य में और अधिक आपूर्ति की संभावना भी जताई।

इस समझौते की घोषणा ऐसे समय हुई है, जब अमेरिका में डीजल की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं। कृषि, माल ढुलाई और परिवहन क्षेत्र में डीजल की अहम भूमिका है। ईंधन की महंगाई का असर आम उपभोक्ताओं के साथ कारोबार और महंगाई दर पर भी पड़ता है।

रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ने रूसी डीजल के आयात को संभव बनाने के लिए प्रतिबंधों में अस्थायी छूट भी दी है। इससे रूस को ऊर्जा निर्यात से राजस्व मिलने का रास्ता खुलता है, जबकि अमेरिका को अपनी ईंधन जरूरतों के लिए अतिरिक्त आपूर्ति मिलने की उम्मीद है।

यूक्रेन ने जताई नाराजगी, कहा- रूस को मिलेगा युद्ध जारी रखने का पैसा

रूस से डीजल खरीदने के फैसले पर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि रूस पर ऊर्जा प्रतिबंधों में ढील देने से मॉस्को को युद्ध जारी रखने के लिए अतिरिक्त संसाधन मिल सकते हैं।

जेलेंस्की ने इस फैसले को मजबूत सहयोगियों का कमजोर निर्णय बताया। यूक्रेन का तर्क है कि रूस को तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री से होने वाली कमाई उसके सैन्य अभियान को जारी रखने में मदद कर सकती है।

यह घोषणा उस समय भी हुई, जब अमेरिकी प्रतिनिधि यूक्रेनी अधिकारियों के साथ युद्ध खत्म करने के प्रस्तावों पर बातचीत कर रहे थे। ऐसे में इस समझौते ने अमेरिका, यूक्रेन और रूस के बीच कूटनीतिक समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

क्या रूस से डीजल खरीदने से अमेरिका में कीमतें घटेंगी?

ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि रूस से अतिरिक्त डीजल मिलने से अमेरिकी बाजार में आपूर्ति बढ़ेगी और ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। हालांकि, ऊर्जा बाजार के विश्लेषकों ने इस समझौते के असर को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है।

रिपोर्टों में विशेषज्ञों ने कहा है कि घोषित मात्रा से बाजार को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इससे लंबे समय तक कीमतें कम रहने की गारंटी नहीं है। रूस की रिफाइनरियों की स्थिति, उत्पादन क्षमता, निर्यात की वास्तविक मात्रा और वैश्विक मांग जैसे कारक भी कीमतों को प्रभावित करेंगे।

इसलिए इस समझौते का वास्तविक प्रभाव तभी स्पष्ट होगा, जब आपूर्ति शुरू होगी और बाजार में उपलब्ध ईंधन की मात्रा पर उसका असर दिखेगा।

भारत के लिए क्यों अहम है ट्रंप का यह फैसला?

भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूसी ऊर्जा की खरीद लंबे समय से अमेरिका के साथ व्यापारिक बातचीत का संवेदनशील मुद्दा रही है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और किफायती आपूर्ति को प्राथमिकता देता रहा है, जबकि अमेरिका ने रूस की आय पर अंकुश लगाने के लिए दूसरे देशों पर दबाव बनाया है।

अब अमेरिका का खुद रूस से डीजल खरीदने का फैसला भारत को यह सवाल उठाने का आधार देता है कि ऊर्जा व्यापार के मामले में अलग-अलग देशों के लिए अलग मानक क्यों अपनाए जाएं। यदि अमेरिकी बाजार की जरूरतों के चलते रूसी डीजल खरीदना स्वीकार्य है, तो भारत की ऊर्जा जरूरतों और उसके आयात संबंधी फैसलों पर भी समान कसौटी लागू करने की मांग उठ सकती है।

हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस समझौते से भारत पर लगे टैरिफ अपने आप खत्म हो जाएंगे या अमेरिकी नीति में तत्काल बदलाव आएगा। इसके लिए दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत और संबंधित अमेरिकी फैसलों को देखना होगा।

ट्रंप की ऊर्जा नीति पर दोहरे मापदंडों की बहस

रूस से डीजल खरीदने की घोषणा ने अमेरिकी ऊर्जा नीति में व्यावहारिक जरूरतों और विदेश नीति के बीच टकराव को सामने ला दिया है। एक ओर वॉशिंगटन रूस की युद्ध संबंधी कमाई रोकने की बात करता रहा है, वहीं दूसरी ओर घरेलू ईंधन कीमतों और आपूर्ति के दबाव के बीच रूस से डीजल लेने का फैसला किया गया है।

भारत के संदर्भ में यह घटनाक्रम इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि रूसी तेल खरीद को लेकर नई दिल्ली पर पहले आर्थिक दबाव बनाया गया था। अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका ऊर्जा सुरक्षा के मामले में अपने लिए अलग रास्ता अपना रहा है? इस बहस का जवाब आने वाले समय में अमेरिकी प्रतिबंध नीति, टैरिफ फैसलों और भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों से स्पष्ट हो सकता है।