Trump Tariffs on India: भारत पर लगाया टैरिफ अमेरिका को पड़ा भारी, मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान
डोनाल्ड ट्रंप के भारत पर 50 फीसदी तक टैरिफ लगाने का असर अमेरिकी कारोबारियों और उपभोक्ताओं पर भी पड़ा। महंगाई और बढ़ती जीवनयापन लागत 2026 के मिडटर्म चुनाव में बड़े मुद्दे बने। जानिए कैसे टैरिफ नीति, महंगे सामान और आर्थिक दबाव ने रिपब्लिकन पार्टी के चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित किया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत समेत कई देशों से आने वाले सामान पर भारी आयात शुल्क लगाकर अमेरिकी उद्योगों को फायदा पहुंचाने और विदेशी देशों पर दबाव बनाने की नीति अपनाई थी। लेकिन इस फैसले का असर अमेरिकी बाजार और आम लोगों की जेब पर भी पड़ा। भारत से आने वाले कपड़े, आभूषण, बासमती चावल और अन्य सामान महंगे हुए, जबकि अमेरिकी कारोबारियों को भी बढ़ी लागत का सामना करना पड़ा। अब 2026 के अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में महंगाई और बढ़ती जीवनयापन लागत मतदाताओं के बड़े मुद्दे बनकर सामने आए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों में जीत दर्ज की है। ऐसे में ट्रंप की टैरिफ नीति को रिपब्लिकन पार्टी के चुनावी नुकसान से जोड़कर देखा जा रहा है।
ट्रंप ने भारत पर क्यों लगाया था 50 फीसदी टैरिफ?
डोनाल्ड ट्रंप ने 20 जनवरी 2025 को दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद संभालने के बाद 'अमेरिका फर्स्ट' नीति को आगे बढ़ाया। इसी के तहत 2 अप्रैल 2025 को उन्होंने कई देशों से आयात होने वाले सामान पर 10 फीसदी बेसलाइन रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि दूसरे देश लंबे समय से अमेरिका के साथ व्यापार में अनुचित फायदा उठा रहे हैं।
भारत पर शुरुआत में 26 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया गया, जिसे बाद में संशोधित कर 25 फीसदी कर दिया गया। इसके बाद अगस्त 2025 में रूस से तेल खरीद जारी रखने के मुद्दे पर भारत से आयात होने वाले कई सामान पर 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगा दिया गया। इससे कई भारतीय उत्पादों पर कुल अमेरिकी आयात शुल्क 50 फीसदी तक पहुंच गया।
ट्रंप प्रशासन की दलील थी कि इससे अमेरिकी बाजार और घरेलू उद्योगों को सुरक्षा मिलेगी। हालांकि, इसका आर्थिक बोझ अमेरिकी आयातकों और उपभोक्ताओं तक भी पहुंचा।
विदेशी कंपनियों ने नहीं, अमेरिकी कारोबारियों और ग्राहकों ने चुकाई टैरिफ की कीमत
ट्रंप की टैरिफ नीति को लेकर जर्मनी के कील इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड इकोनॉमी (Kiel Institute for the World Economy) की रिसर्च में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई। संस्थान ने अमेरिका के करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के आयात से जुड़े 2.5 करोड़ से अधिक शिपमेंट रिकॉर्ड का विश्लेषण किया।
रिसर्च के मुताबिक, विदेशी निर्यातकों ने टैरिफ के कुल बोझ का केवल करीब 4 फीसदी हिस्सा उठाया, जबकि लगभग 96 फीसदी बोझ अमेरिकी खरीदारों पर पड़ा। यानी विदेशी कंपनियों ने अपने उत्पादों की कीमतों में उतनी कटौती नहीं की, जितनी टैरिफ का असर कम करने के लिए जरूरी थी। इसका बड़ा हिस्सा अमेरिकी आयातकों, कारोबारियों और अंततः ग्राहकों तक पहुंचा।
टैरिफ का भुगतान अमेरिकी सीमा शुल्क विभाग को आयात के समय करना होता है। इसके बाद आयातक इस अतिरिक्त लागत को खुद वहन कर सकता है या सप्लाई चेन के जरिए ग्राहकों तक पहुंचा सकता है।
भारत से आने वाले किन सामानों पर पड़ा असर?
अमेरिका भारत से बड़ी मात्रा में कपड़े, हीरे, आभूषण, खाद्य पदार्थ और ऑटोमोबाइल के पुर्जे आयात करता है। टैरिफ बढ़ने के बाद इन क्षेत्रों में अमेरिकी कारोबारियों की लागत बढ़ने का दबाव देखने को मिला।
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कपड़ा उद्योग: अमेरिकी बाजार में भारतीय कॉटन कपड़े, रेडीमेड गारमेंट्स और होम लिनेन की थोक कीमतों पर दबाव बढ़ा। अमेरिका अपने आयातित टेक्सटाइल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा भारत से प्राप्त करता है।
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हीरे और आभूषण: जेम एंड ज्वेलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (GJEPC) के अनुसार, भारत दुनिया में हीरों की पॉलिशिंग का करीब 90 फीसदी हिस्सा करता है। टैरिफ के कारण अमेरिकी ज्वेलरी कारोबारियों को पॉलिश्ड डायमंड और सोने के आभूषण महंगे पड़ने लगे।
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खाद्य पदार्थ: भारतीय बासमती चावल, मसालों और फ्रोजन झींगा जैसे आयातित उत्पादों की खुदरा कीमतों पर भी असर पड़ा।
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ऑटोमोबाइल पार्ट्स: इंजन पार्ट्स, कास्टिंग और रिप्लेसमेंट कंपोनेंट्स की लागत बढ़ने से अमेरिकी ऑटो रिपेयर बाजार पर भी दबाव पड़ा।
इन बढ़ी हुई लागतों का असर सिर्फ आयातकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम अमेरिकी ग्राहकों को भी महंगे सामान के रूप में इसका सामना करना पड़ा।
अमेरिकी मतदाताओं के लिए महंगाई बना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा
2026 के अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में महंगाई और जीवनयापन की बढ़ती लागत ने अहम भूमिका निभाई। रॉयटर्स/इप्सोस के चुनाव से पहले किए गए सर्वे के मुताबिक, 48 फीसदी पंजीकृत मतदाताओं ने जीवनयापन की लागत को अपने वोट को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा मुद्दा बताया।
सर्वे में 26 फीसदी लोगों ने लोकतांत्रिक मानदंडों और 13 फीसदी ने इमिग्रेशन को प्रमुख मुद्दा माना।
एक अन्य महत्वपूर्ण आंकड़े के मुताबिक, 49 फीसदी मतदाताओं ने कहा कि जनवरी 2025 में ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हुई है। वहीं, केवल 13 फीसदी लोगों ने आर्थिक स्थिति में सुधार की बात कही, जबकि 37 फीसदी ने कहा कि उनकी आर्थिक स्थिति लगभग पहले जैसी ही रही।
हिस्पैनिक मतदाताओं के बीच भी आर्थिक परेशानी का असर दिखाई दिया। इस वर्ग के 54 फीसदी लोगों ने परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की बात कही, जबकि केवल 10 फीसदी ने सुधार बताया।
टेड क्रूज ने भी उठाया अमेरिकी परिवारों की आर्थिक परेशानी का मुद्दा
रिपब्लिकन पार्टी के टेक्सास से सीनेटर टेड क्रूज ने चुनाव के बाद अमेरिकी परिवारों की आर्थिक परेशानियों को लेकर एक आंकड़े का हवाला दिया। उन्होंने जॉर्जटाउन ब्लड एंड प्लाज्मा रिसर्च ग्रुप के शोध का जिक्र करते हुए बताया कि 2026 में अमेरिकियों ने 7.5 करोड़ से अधिक बार पैसे लेकर प्लाज्मा डोनेट किया।
क्रूज के मुताबिक, हर दिन करीब 2 लाख अमेरिकी लोग किराने का सामान खरीदने जैसे रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के लिए प्लाज्मा दान कर रहे थे। उनका यह बयान अमेरिकी परिवारों पर बढ़ते आर्थिक दबाव को लेकर चर्चा में रहा।
उन्होंने चुनाव के बाद यह भी स्वीकार किया कि रिपब्लिकन मतदाताओं, निर्दलीय और लिबर्टेरियन मतदाताओं ने मतदान तो किया, लेकिन पर्याप्त संख्या में रिपब्लिकन उम्मीदवारों का समर्थन नहीं किया।
ट्रंप की टैरिफ नीति से कितना बढ़ा अमेरिकी सरकार का राजस्व?
टैरिफ के कारण 2025 में अमेरिकी कस्टम राजस्व में करीब 200 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। हालांकि, सरकारी राजस्व में इस वृद्धि का अर्थ यह नहीं था कि अमेरिकी उपभोक्ताओं को इसका सीधा आर्थिक फायदा मिला।
दरअसल, आयात शुल्क से सरकार को अतिरिक्त पैसा मिला, लेकिन इसकी लागत का बड़ा हिस्सा घरेलू आयातकों और खरीदारों ने उठाया। इसी वजह से टैरिफ को एक तरह के उपभोग कर (Consumption Tax) की तरह भी देखा गया।
इसका असर रोजमर्रा की खरीदारी से लेकर कपड़े, खाद्य पदार्थ और वाहन मरम्मत जैसे क्षेत्रों तक पहुंचा।
क्या टैरिफ नीति ही रिपब्लिकन पार्टी की हार की वजह बनी?
अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को हुए नुकसान के पीछे सिर्फ भारत पर लगाया गया टैरिफ या व्यापार नीति जिम्मेदार नहीं थी। चुनाव में महंगाई, ईरान युद्ध की लागत, ऊर्जा और ईंधन की कीमतें, भ्रष्टाचार और अन्य राजनीतिक मुद्दे भी अहम रहे।
कैनसस में मतदान से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए टेड क्रूज ने बताया कि 30.6 फीसदी मतदाताओं के लिए जीवनयापन की लागत, ऊर्जा और किराने का खर्च सबसे बड़ा मुद्दा था। इसके बाद 18.5 फीसदी लोगों ने भ्रष्टाचार और 10.1 फीसदी ने ईरान युद्ध की लागत को प्रमुख मुद्दा बताया।
इससे स्पष्ट होता है कि मतदाताओं की नाराजगी कई मुद्दों से जुड़ी थी। ट्रंप ने मध्यावधि चुनाव को अपनी नीतियों और नेतृत्व पर जनमत संग्रह की तरह पेश किया था। लेकिन चुनाव में आर्थिक परेशानियां और बढ़ती महंगाई प्रमुख मुद्दे बनकर सामने आईं।
