अमेरिका पर चढ़ा 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज, ईरान से जंग के बीच क्यों बढ़ी ट्रंप की टेंशन? जानिए पूरा मामला
America Debt Crisis: अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया है। यह आंकड़ा ऐसे समय सामने आया है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने ईरान के साथ बढ़ता तनाव, महंगा होता कच्चा तेल, महंगाई और बढ़ती रक्षा लागत जैसी कई चुनौतियां हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ईरान के साथ संघर्ष ने अमेरिका के पुराने कर्ज संकट को और गंभीर बना दिया है? हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों से यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका का 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज सिर्फ ईरान युद्ध की वजह से बढ़ा है।
अमेरिका का कर्ज पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार
अमेरिकी ट्रेजरी के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका का सकल राष्ट्रीय कर्ज अगस्त 2026 में पहली बार 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच गया। 19 अगस्त को सामने आए आंकड़ों में कर्ज करीब 40.047 ट्रिलियन डॉलर था। 2017 में यह करीब 19.95 ट्रिलियन डॉलर था, यानी लगभग एक दशक में यह रकम दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है।
इस कर्ज में करीब 32.3 ट्रिलियन डॉलर जनता के पास मौजूद अमेरिकी सरकारी सिक्योरिटीज हैं, जबकि लगभग 7.8 ट्रिलियन डॉलर सरकार के अंदरूनी खातों के बीच बकाया है। यही वजह है कि 40 ट्रिलियन डॉलर का आंकड़ा सिर्फ एक बड़ी संख्या नहीं है। यह अमेरिका के बढ़ते बजट घाटे और लगातार उधार पर निर्भर सरकारी खर्च की तस्वीर भी दिखाता है।
आखिर अमेरिका इतना कर्ज क्यों ले रहा है?
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अमेरिकी सरकार लंबे समय से अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च करती रही है। जब सरकार का खर्च उसकी टैक्स और दूसरी आय से ज्यादा होता है, तो इस अंतर को पूरा करने के लिए उसे कर्ज लेना पड़ता है।
अमेरिका में यह समस्या किसी एक राष्ट्रपति या एक सरकार की देन नहीं है। कोविड के दौरान बड़े पैमाने पर सरकारी खर्च, टैक्स नीतियां, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य कार्यक्रम, रक्षा खर्च और लगातार बढ़ते ब्याज भुगतान ने लंबे समय में कर्ज को बढ़ाया है।
अमेरिकी कांग्रेस के बजट कार्यालय यानी CBO के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में अमेरिकी बजट घाटा करीब 1.9 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है। मौजूदा कानूनों के आधार पर यह घाटा 2036 तक बढ़कर करीब 3.1 ट्रिलियन डॉलर हो सकता है।
असली चिंता सिर्फ 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज नहीं
अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता कर्ज की रकम के साथ-साथ उस पर चुकाया जाने वाला ब्याज भी है। जैसे-जैसे ज्यादा कर्ज लिया जाता है और पुराने कर्ज को नई, ऊंची ब्याज दरों पर रीफाइनेंस करना पड़ता है, सरकार का ब्याज खर्च बढ़ता जाता है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी सरकार का सालाना ब्याज खर्च करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंच गया है।
यानी सरकार को अपने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए भी बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और दूसरे सरकारी कार्यक्रमों के लिए उपलब्ध धन पर दबाव बढ़ सकता है।
क्या ईरान युद्ध ने अमेरिका को कर्ज में डुबो दिया?
नहीं। इसे सीधे तौर पर ऐसा कहना सही नहीं होगा। अमेरिका का कर्ज ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष से काफी पहले ही तेजी से बढ़ रहा था। 2017 में यह करीब 20 ट्रिलियन डॉलर था और कोविड के दौर में सरकारी खर्च बढ़ने के बाद कर्ज में तेज उछाल आया। ट्रंप और जो बाइडन दोनों के कार्यकाल में अमेरिकी कर्ज बढ़ा है।
लेकिन ईरान के साथ लंबा संघर्ष पहले से मौजूद वित्तीय दबाव को और बढ़ा सकता है। युद्ध का मतलब है ज्यादा सैन्य तैनाती, हथियार, मिसाइल, एयर डिफेंस, नौसेना और दूसरे सैन्य अभियानों पर अतिरिक्त खर्च।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF ने भी अपने विश्लेषण में चेतावनी दी है कि बड़े रक्षा खर्च से अल्पावधि में आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं, लेकिन लंबे समय में इससे राजकोषीय घाटा और सार्वजनिक कर्ज बढ़ सकता है। IMF के अनुसार युद्ध जैसी परिस्थितियों में सार्वजनिक कर्ज पर दबाव और भी ज्यादा बढ़ सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से अमेरिका की दूसरी परेशानी
ईरान के साथ तनाव का असर सिर्फ अमेरिकी रक्षा बजट तक सीमित नहीं है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। यहां लंबे समय तक तनाव रहने से वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। तेल महंगा होने का असर पेट्रोल-डीजल से लेकर ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत तक पहुंचता है। इससे महंगाई बढ़ सकती है।
और यहीं से अमेरिका के लिए एक और समस्या पैदा होती है। अगर महंगाई ज्यादा बनी रहती है तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व के लिए ब्याज दरों में तेजी से कटौती करना मुश्किल हो सकता है। ऊंची ब्याज दरें सरकार के लिए नए कर्ज की लागत बढ़ा सकती हैं।
यानी युद्ध का असर रक्षा खर्च → तेल की कीमत → महंगाई → ब्याज दर → सरकारी कर्ज की लागत के रास्ते से भी दिखाई दे सकता है।
बॉन्ड मार्केट भी दे रहा है संकेत
अमेरिकी ट्रेजरी बाजार में भी निवेशकों की चिंता दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में लंबी अवधि के अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड ऊंचे स्तर पर रही है। अमेरिकी ट्रेजरी ने बाजार में स्थिरता और लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए बॉन्ड बायबैक बढ़ाने का फैसला भी किया है।
अगर निवेशक लंबे समय के लिए अमेरिकी सरकार को पैसा देने के बदले ज्यादा ब्याज मांगते हैं, तो इसका मतलब सरकार के लिए भविष्य में कर्ज लेना और महंगा हो सकता है।
तो क्या अमेरिका दिवालिया होने वाला है?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज निश्चित तौर पर अमेरिका के लिए गंभीर राजकोषीय चुनौती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका तुरंत दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच गया है।
अमेरिका की अर्थव्यवस्था बेहद बड़ी है और उसकी सरकार अपनी मुद्रा यानी डॉलर में कर्ज लेती है। अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। अगर आने वाले वर्षों में सरकार का खर्च लगातार आय से काफी ज्यादा रहता है, कर्ज तेजी से बढ़ता है और ब्याज भुगतान बजट का बड़ा हिस्सा खाता जाता है, तो समस्या गंभीर हो सकती है।
CBO का अनुमान है कि जनता के पास मौजूद अमेरिकी संघीय कर्ज 2026 में GDP के करीब 101% से बढ़कर 2036 तक 120% तक पहुंच सकता है।
अमेरिका के सामने असली चुनौती क्या है?
इसलिए फिलहाल सवाल यह नहीं है कि “क्या अमेरिका कल दिवालिया हो जाएगा?” बल्कि सवाल यह है कि क्या अमेरिका अपने मौजूदा कर्ज और घाटे की रफ्तार को लंबे समय तक संभाल पाएगा।
ईरान युद्ध ने अमेरिकी वित्तीय स्थिति को पैदा नहीं किया है, लेकिन अगर संघर्ष लंबा चलता है तो रक्षा खर्च, तेल की कीमत, महंगाई और ब्याज लागत के जरिए अमेरिका के पहले से मौजूद कर्ज संकट पर अतिरिक्त दबाव जरूर डाल सकता है। 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज अमेरिका के लिए खतरे की घंटी जरूर है, लेकिन इसे अमेरिकी सुपरपावर के तत्काल पतन या दिवालिया होने का प्रमाण कहना तथ्यों से ज्यादा दूर की बात होगी।
