38 लाख अपीलें, सिर्फ 1.26 लाख का निपटारा! बंगाल में SIR को लेकर चुनाव आयोग और जज आमने-सामने
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग और न्यायिक अधिकारियों के बीच विवाद गहराता जा रहा है। मतदाता सूची से नाम हटाए जाने या नाम जोड़ने से जुड़ी अपीलों पर फैसला सुनाने वाले जजों से अब चुनाव आयोग ने PAN कार्ड और सरकारी पहचानपत्र समेत कई दस्तावेज मांगे हैं। इस नए विवाद का असर अपीलों के निपटारे पर भी पड़ रहा है।
अंग्रेजी अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय ने न्यायिक अधिकारियों को ऑनलाइन आदेश जारी करने के लिए डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) बनवाने को कहा है। इसके लिए 28 अक्टूबर को संबंधित एजेंसी की ओर से जजों को ईमेल भेजा गया। इसमें PAN कार्ड, सरकारी पहचानपत्र, फोटो, मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी जैसी जानकारियां मांगी गई हैं।
वीडियो कॉल पर भी होगा जजों का पहचान सत्यापन
डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट बनवाने की प्रक्रिया में जजों को पहले मोबाइल नंबर और ईमेल पर भेजे गए OTP के जरिए अपनी पहचान सत्यापित करनी होगी। इसके बाद वीडियो कॉल के माध्यम से भी पहचान की जांच की जाएगी। इस दौरान संबंधित न्यायिक अधिकारी को कैमरे के सामने अपना असली PAN कार्ड और सरकारी पहचानपत्र दिखाना होगा।
चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को लेकर न्यायिक अधिकारियों की आपत्ति सामने आई है। उनका कहना है कि ऑनलाइन आदेश जारी करने के लिए इस तरह की पहचान सत्यापन प्रक्रिया पर पहले से ही सवाल उठाए जा रहे हैं।
आखिर क्यों शुरू हुआ चुनाव आयोग और जजों के बीच विवाद?
इस विवाद की शुरुआत 21 सितंबर को हुई थी, जब चुनाव आयोग ने अपने ऑनलाइन पोर्टल पर आधार कार्ड के जरिए पहचान सत्यापन की व्यवस्था लागू की थी। न्यायिक अधिकारियों ने इस पर आपत्ति जताते हुए 24 सितंबर को पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखा और इस व्यवस्था को हटाने की मांग की।
हालांकि, उनकी मांग पर कोई बदलाव नहीं किया गया। इसके बाद जजों ने पोर्टल पर लॉगइन करना बंद कर दिया। वे ऑनलाइन काम से दूर हो गए, लेकिन ऑफलाइन तरीके से अपनी जिम्मेदारियां निभाते रहे। अब डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट के लिए नए दस्तावेज मांगे जाने से विवाद और बढ़ गया है।
38 लाख से ज्यादा अपीलें, अब तक सिर्फ 1.26 लाख का निपटारा
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर उन मतदाताओं पर पड़ रहा है, जिन्होंने वोटर लिस्ट में नाम हटाए जाने या नाम शामिल कराने को लेकर अपील की है।
चुनाव आयोग ने सितंबर में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल की गई थीं। इनमें से 10 सितंबर तक केवल 1.26 लाख अपीलों का ही निपटारा हो पाया था। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, पोर्टल पर जारी विवाद के चलते जज ऑनलाइन अंतिम आदेश जारी नहीं कर पा रहे हैं।
ऐसे में लाखों मतदाताओं को अपनी अपीलों पर फैसले का इंतजार करना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को सौंपी थी जिम्मेदारी
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग और तत्कालीन तृणमूल कांग्रेस सरकार के बीच विवाद के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। शीर्ष अदालत ने 20 फरवरी को आदेश दिया था कि मतदाताओं की पात्रता से जुड़े मामलों की जांच न्यायिक अधिकारी करेंगे।
इन अधिकारियों ने कुल 60.06 लाख मतदाताओं के मामलों की जांच की। इसके बाद 27.16 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जिन लोगों को इस कार्रवाई पर आपत्ति थी, उनके लिए अपील की व्यवस्था की गई और इन मामलों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायाधिकरणों में न्यायिक अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई।
अब पहचान सत्यापन और डिजिटल सिग्नेचर को लेकर चुनाव आयोग तथा जजों के बीच बढ़ते मतभेद ने इस पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर दिया है। सबसे अहम सवाल यह है कि लाखों लंबित अपीलों पर समय रहते फैसला कैसे होगा और मतदाताओं को राहत कब मिलेगी।
