पहलगाम आतंकी हमले के एक साल बाद भी नहीं थमा ऐशान्या का दर्द, बोली- ये ऐसा जख्म है जो कभी नहीं भर सकता
Apr 22, 2026, 10:59 IST
WhatsApp Channel
Join Now
Facebook Profile
Join Now
Instagram Profile
Join Now
पहलगाम आतंकी हमले को आज एक साल पूरा हो गया है, लेकिन उस दर्द की टीस आज भी जिंदा है। 22 अप्रैल को हुए इस हमले में आतंकियों ने नाम और मजहब पूछकर 26 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। इस खौफनाक वारदात में कानपुर के 30 वर्षीय शुभम द्विवेदी को उनकी पत्नी ऐशान्या के सामने सिर में गोली मार दी गई थी।
दो महीने पहले ही शादी के बंधन में बंधे इस नवविवाहित जोड़े की खुशियां एक पल में तबाह हो गईं। आज, एक साल बाद भी ऐशान्या उस मंजर को भूल नहीं पाई हैं।
न एनिवर्सरी मना पाई, न त्योहार
ऐशान्या कहती हैं, “हमारी शादी को सिर्फ दो महीने हुए थे। न कोई त्योहार मना पाई, न एनिवर्सरी। अब सिर्फ यादें ही बची हैं। जब तक आतंकवाद जड़ से खत्म नहीं होगा, तब तक हमें सुकून नहीं मिलेगा।”
वह बताती हैं कि हर दिन उनके लिए एक नई चुनौती है। “जब भी कोई खुशी मिलती है, दिल करता है उन्हें बताऊं... फिर याद आता है कि अब वो नहीं हैं।”
पिता हर दिन तस्वीर देखकर शुरू करते हैं दिन
शुभम के पिता संजय द्विवेदी आज भी बेटे की याद में जी रहे हैं। उन्होंने अपने ऑफिस में बेटे की तस्वीर लगा रखी है और हर दिन काम शुरू करने से पहले उसे निहारते हैं। इतना ही नहीं, हर महीने गांव में शुभम की याद में भोज का आयोजन भी करते हैं।
ये जिंदगी भर का दर्द है
ऐशान्या उस दर्द को शब्दों में बयां नहीं कर पातीं। “पति को अपनी आंखों के सामने खो देना... ये ऐसा जख्म है जो कभी नहीं भर सकता। ये पूरी जिंदगी का दर्द है।”
वह बताती हैं कि 17 अप्रैल को वे घूमने निकले थे और उस समय की तस्वीरें आज भी उनके पास हैं। “तस्वीरें देखकर लगता है कि हम कितने खुश थे… लेकिन 22 अप्रैल ने सब खत्म कर दिया।”
परिवार बना सहारा
इस कठिन समय में ऐशान्या को अपने परिवार का पूरा साथ मिला। वह कहती हैं, “अगर परिवार साथ न होता तो शायद हम टूट जाते। सास-ससुर और मेरे माता-पिता ने हमें संभाला।”
न्याय की उम्मीद अभी बाकी
ऐशान्या और उनके परिवार को आज भी न्याय का इंतजार है। उनका कहना है कि जब तक आतंकवाद का पूरी तरह खात्मा नहीं होता, तब तक यह घाव भरेगा नहीं।
दो महीने पहले ही शादी के बंधन में बंधे इस नवविवाहित जोड़े की खुशियां एक पल में तबाह हो गईं। आज, एक साल बाद भी ऐशान्या उस मंजर को भूल नहीं पाई हैं।
न एनिवर्सरी मना पाई, न त्योहार
ऐशान्या कहती हैं, “हमारी शादी को सिर्फ दो महीने हुए थे। न कोई त्योहार मना पाई, न एनिवर्सरी। अब सिर्फ यादें ही बची हैं। जब तक आतंकवाद जड़ से खत्म नहीं होगा, तब तक हमें सुकून नहीं मिलेगा।”
वह बताती हैं कि हर दिन उनके लिए एक नई चुनौती है। “जब भी कोई खुशी मिलती है, दिल करता है उन्हें बताऊं... फिर याद आता है कि अब वो नहीं हैं।”
पिता हर दिन तस्वीर देखकर शुरू करते हैं दिन
शुभम के पिता संजय द्विवेदी आज भी बेटे की याद में जी रहे हैं। उन्होंने अपने ऑफिस में बेटे की तस्वीर लगा रखी है और हर दिन काम शुरू करने से पहले उसे निहारते हैं। इतना ही नहीं, हर महीने गांव में शुभम की याद में भोज का आयोजन भी करते हैं।
ये जिंदगी भर का दर्द है
ऐशान्या उस दर्द को शब्दों में बयां नहीं कर पातीं। “पति को अपनी आंखों के सामने खो देना... ये ऐसा जख्म है जो कभी नहीं भर सकता। ये पूरी जिंदगी का दर्द है।”
वह बताती हैं कि 17 अप्रैल को वे घूमने निकले थे और उस समय की तस्वीरें आज भी उनके पास हैं। “तस्वीरें देखकर लगता है कि हम कितने खुश थे… लेकिन 22 अप्रैल ने सब खत्म कर दिया।”
परिवार बना सहारा
इस कठिन समय में ऐशान्या को अपने परिवार का पूरा साथ मिला। वह कहती हैं, “अगर परिवार साथ न होता तो शायद हम टूट जाते। सास-ससुर और मेरे माता-पिता ने हमें संभाला।”
न्याय की उम्मीद अभी बाकी
ऐशान्या और उनके परिवार को आज भी न्याय का इंतजार है। उनका कहना है कि जब तक आतंकवाद का पूरी तरह खात्मा नहीं होता, तब तक यह घाव भरेगा नहीं।
