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Assam Flyover Politics: गुवाहाटी के नए फ्लाईओवर का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर क्यों? CM हिमंत बिस्वा ने बताई वजह

गुवाहाटी में 376 करोड़ के नए फ्लाईओवर का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर क्यों रखा गया? सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि 1947 में मुखर्जी और गोपीनाथ बोरदोलोई ने असम को ईस्ट पाकिस्तान में जाने से बचाने में अहम भूमिका निभाई थी। जानिए पूरा इतिहास।

 
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Guwahati Flyover Syama Prasad Mookerjee: असम की राजधानी गुवाहाटी में शुक्रवार को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने 376 करोड़ रुपये की लागत से बने नए फ्लाईओवर का उद्घाटन किया। 2.8 किलोमीटर लंबा यह फ्लाईओवर लालगणेश और साइकिल फैक्ट्री इलाके को जोड़ता है, जिससे शहर के ट्रैफिक जाम से राहत मिलने की उम्मीद है। लेकिन उद्घाटन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा फ्लाईओवर के नाम को लेकर शुरू हो गई। इस फ्लाईओवर का नाम भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखा गया है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने साफ कहा कि यह सिर्फ एक फ्लाईओवर नहीं, बल्कि असम के इतिहास और भारत की एकता से जुड़ी याद का प्रतीक है। उनके मुताबिक, अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और गोपीनाथ बोरदोलोई उस समय संघर्ष नहीं करते, तो आज असम भारत का हिस्सा नहीं होता।

आखिर असम को भारत में बनाए रखने में क्या थी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका?

1947 में देश के विभाजन के दौरान मुस्लिम लीग पूर्वोत्तर भारत और पूरे बंगाल को ईस्ट पाकिस्तान में शामिल करने की कोशिश कर रही थी। कैबिनेट मिशन प्लान के तहत असम और बंगाल को Group-C राज्यों में रखा गया था। यह प्रस्ताव भविष्य में पूरे पूर्वोत्तर को पाकिस्तान की ओर धकेल सकता था।

उस समय असम में बड़ी संख्या में बंगाली मुस्लिम आबादी होने के कारण राजनीतिक और जनसांख्यिकीय दबाव तेजी से बढ़ रहा था। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यदि वह योजना सफल हो जाती, तो आज असम भारत का हिस्सा नहीं होता।

उन्होंने कहा कि उस दौर में गोपीनाथ बोरदोलोई ने असम के भीतर आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष संभाला, जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्तर पर असम की आवाज बुलंद की। दोनों नेताओं के संयुक्त प्रयासों के चलते कांग्रेस नेतृत्व और ब्रिटिश प्रशासन पर दबाव बना और अंततः असम को भारत में बनाए रखने का रास्ता साफ हुआ।

हिमंत सरमा बोले- मुखर्जी ने असम को सिर्फ सीमा नहीं, भारत की आत्मा माना

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने असम को कभी भारत के “दूरस्थ इलाके” के रूप में नहीं देखा। उन्होंने असम की भाषा, संस्कृति और लोगों को भारत की पहचान का अभिन्न हिस्सा माना।

सरमा ने कहा कि मुखर्जी ने असमिया भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने की दिशा में भी अहम काम किया। जब वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति थे, तब उन्होंने असमिया भाषा और उच्च शिक्षा को मजबूत करने के लिए प्रयास किए।

उन्होंने बताया कि डॉ. बिरिंची कुमार बरुआ के साथ मिलकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने असमिया अध्ययन को नई दिशा दी। यही कारण है कि आज भी असम में उन्हें सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व्यक्तित्व माना जाता है।

1947 का फैसला नहीं बदलता तो पूर्वोत्तर की तस्वीर अलग होती

हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि आज असम के लोग अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान के साथ भारत में रह पा रहे हैं, तो इसका श्रेय गोपीनाथ बोरदोलोई और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं को जाता है।

उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को यह इतिहास जानना चाहिए कि किस तरह उस समय राजनीतिक संघर्ष ने असम को भारत में बनाए रखा। मुख्यमंत्री के मुताबिक, यह फ्लाईओवर सिर्फ यातायात की सुविधा नहीं, बल्कि इतिहास और राष्ट्रवाद की याद भी है।

फ्लाईओवर से ट्रैफिक राहत, राजनीति और इतिहास दोनों की चर्चा

गुवाहाटी का यह नया फ्लाईओवर शहर के सबसे व्यस्त इलाकों में ट्रैफिक दबाव कम करने के लिए तैयार किया गया है। लेकिन इसके उद्घाटन के साथ ही यह परियोजना राजनीतिक और ऐतिहासिक बहस का केंद्र बन गई है।

बीजेपी इसे राष्ट्रवादी विरासत से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्ष इस पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं दे रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने साफ कहा कि यह नाम किसी राजनीति के लिए नहीं, बल्कि इतिहास के सम्मान में रखा गया है।

यह सिर्फ फ्लाईओवर नहीं, इतिहास को धन्यवाद है - हिमंत

अपने बयान के अंत में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि जब लोग इस फ्लाईओवर से गुजरेंगे, तो वे सिर्फ सड़क पार नहीं करेंगे, बल्कि उस इतिहास को भी याद करेंगे जिसने असम को भारत में बनाए रखा। उन्होंने कहा, यह सिर्फ एक फ्लाईओवर नहीं है, बल्कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक लंबे समय से लंबित धन्यवाद है।