BRICS Summit: भारत ने कैसे हासिल की बड़ी कूटनीतिक जीत? पहलगाम से लेकर ईरान-UAE तक, ये 5 बड़े नतीजे
BRICS Summit: भारत की मेजबानी में हुए 18वें BRICS शिखर सम्मेलन को नई दिल्ली की बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के तौर पर देखा जा रहा है। अलग-अलग भू-राजनीतिक हितों और युद्धों के बीच बंटे BRICS देशों ने नई दिल्ली घोषणा (New Delhi Declaration) को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। भारत पहलगाम आतंकी हमले पर समूह का सामूहिक समर्थन हासिल करने में भी सफल रहा। साथ ही नई दिल्ली ने BRICS को खुलकर एंटी-US या एंटी-वेस्ट मंच बनने से रोकते हुए Global South के मुद्दों पर फोकस बनाए रखा।
BRICS का यह सम्मेलन ऐसे समय हुआ, जब समूह के भीतर पश्चिम एशिया को लेकर गंभीर मतभेद थे। इससे पहले विदेश मंत्रियों की बैठक में भी आम सहमति नहीं बन पाई थी। ऐसे माहौल में नेताओं का संयुक्त घोषणा पत्र पर सहमत होना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है।
ईरान-UAE की मुलाकात ने बढ़ाया भारत का कद
सम्मेलन के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक पश्चिम एशिया का संकट था। BRICS के सदस्य ईरान और UAE इस मुद्दे पर अलग-अलग रुख रखते हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच मतभेद पूरे समूह की एकजुटता को प्रभावित कर सकते थे।
लेकिन दिल्ली में तस्वीर कुछ अलग नजर आई। ईरान और UAE दोनों ने BRICS की उस घोषणा पर सहमति जताई, जिसमें पश्चिम एशिया में संयम और कूटनीति का आह्वान किया गया। इसके अलावा सम्मेलन से इतर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की मुलाकात हुई। यह संघर्ष शुरू होने के बाद दोनों देशों के बीच उच्च स्तर की अहम मुलाकातों में से एक रही।
इससे भारत के लिए यह संदेश गया कि नई दिल्ली केवल BRICS सम्मेलन की मेजबानी करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने अलग-अलग ध्रुवों के बीच संवाद के लिए एक मंच भी उपलब्ध कराया।
नई दिल्ली घोषणा पर बनी आम सहमति
भारत के सामने दूसरा बड़ा लक्ष्य BRICS की संस्थागत विश्वसनीयता को बनाए रखना था। समूह के विस्तार के साथ सदस्य देशों के राजनीतिक और रणनीतिक हित भी ज्यादा विविध हुए हैं। ऐसे में आम सहमति बनाना पहले के मुकाबले मुश्किल हो गया है।
इसके बावजूद 12 सितंबर को BRICS नेताओं ने नई दिल्ली घोषणा को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। घोषणा में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, विकास वित्त, व्यापार, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सप्लाई चेन और दूसरे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने की बात कही गई।
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि BRICS जैसे समूह में संयुक्त घोषणा केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं होती। यह दिखाती है कि सदस्य देशों के बीच गंभीर मतभेदों के बावजूद संगठन साझा मुद्दों पर एक साथ आगे बढ़ सकता है।
पहलगाम हमले पर भारत को मिला बड़ा समर्थन
BRICS सम्मेलन से भारत की सबसे अहम कूटनीतिक उपलब्धियों में 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले का उल्लेख भी रहा।
नई दिल्ली घोषणा में BRICS देशों ने पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की। हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी। घोषणा में आतंकवाद, आतंक की फंडिंग, आतंकियों की सुरक्षित पनाहगाह और सीमा पार आतंकवाद से निपटने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। साथ ही आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात कही गई।
हालांकि, घोषणा में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया। इसके बजाय पहलगाम हमले को स्पष्ट रूप से आतंकी हमला बताते हुए इसमें शामिल लोगों और उनके समर्थकों को जवाबदेह ठहराने की बात कही गई। भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BRICS में चीन भी शामिल है और चीन के पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध हैं।
भारत ने इस मुद्दे को केवल भारत-पाकिस्तान विवाद के रूप में पेश करने के बजाय आतंकवाद के खिलाफ BRICS की व्यापक नीति से जोड़ने की कोशिश की। यही रणनीति नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक रूप से अहम रही।
BRICS को एंटी-US मंच बनने से रोका
भारत के सामने एक और चुनौती यह थी कि BRICS कहीं चीन और रूस के प्रभाव में खुलकर एंटी-US या एंटी-वेस्ट समूह न बन जाए। भारत ने अपनी अध्यक्षता में विकासशील देशों और Global South के मुद्दों को प्राथमिकता दी, लेकिन समूह को किसी एक देश या पश्चिम विरोधी धड़े के रूप में पेश नहीं होने दिया।
नई दिल्ली घोषणा में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, विकासशील देशों की ज्यादा भागीदारी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन किया गया। चीन और रूस ने संयुक्त राष्ट्र समेत अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका की आकांक्षाओं के समर्थन की बात भी कही।
इसके साथ ही घोषणा में एकतरफा प्रतिबंधों और संरक्षणवादी नीतियों की आलोचना की गई। लेकिन भारत का रुख किसी खास देश के खिलाफ गठबंधन बनाने के बजाय ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली और संतुलित वैश्विक व्यवस्था की तरफ रहा।
युद्धों और मतभेदों के बीच भारत ने साधा संतुलन
2026 का BRICS पुराने पांच देशों वाला समूह नहीं रह गया है। विस्तार के बाद इसमें अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक प्राथमिकताओं और रणनीतिक हितों वाले देश शामिल हैं। इस साल चुनौती और बड़ी रही क्योंकि रूस यूक्रेन युद्ध में शामिल है, जबकि ईरान पश्चिम एशिया के गंभीर संघर्ष का हिस्सा रहा है।
इन संघर्षों का असर ऊर्जा, शिपिंग, सप्लाई चेन, खाद्य सुरक्षा और महंगाई तक पर पड़ा है। इसके बावजूद नई दिल्ली घोषणा में अलग-अलग देशों के हितों को जगह देते हुए पश्चिम एशिया में अधिकतम संयम और कूटनीति की अपील की गई।
आर्थिक मोर्चे पर भी घोषणा में लचीलापन, विकास, सप्लाई चेन, तकनीक और वित्तीय सहयोग पर जोर दिया गया। यही वह क्षेत्र है जहां भारत BRICS को Global South की आवाज के रूप में मजबूत करना चाहता है।
मोदी ने तीन दिनों में कीं 15 द्विपक्षीय बैठकें
BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रिय कूटनीति भी चर्चा में रही। सम्मेलन की पूर्व संध्या और दो दिनों के शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी ने विदेशी नेताओं के साथ कुल 15 औपचारिक द्विपक्षीय बैठकें कीं। इनमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई प्रमुख नेताओं के साथ बातचीत शामिल रही।
भारत-चीन संबंधों के लिहाज से भी शी जिनपिंग की दिल्ली यात्रा अहम रही। 2020 के सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव रहा है, लेकिन BRICS के मंच पर बातचीत से रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश का संकेत मिला।
अब चीन के सामने भारत की बनाई सहमति बनाए रखने की चुनौती
दिल्ली BRICS Summit के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने गंभीर मतभेदों के बावजूद समूह को संयुक्त घोषणा पर सहमत कराया। पहलगाम हमले पर सामूहिक निंदा, ईरान-UAE संवाद के लिए मंच और Global South के मुद्दों पर फोकस—इन तीनों ने भारत की कूटनीतिक भूमिका को मजबूत किया।
अब अगली चुनौती चीन के सामने होगी। 2027 में BRICS की अध्यक्षता चीन संभालेगा। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि नई दिल्ली में बनाई गई आम सहमति और समूह की संतुलित भूमिका को बीजिंग किस तरह आगे बढ़ाता है।
