त्योहारी सीजन में लोन लेकर खरीद रहे हैं कार? EMI से लेकर ब्याज तक, इन बातों का रखें ध्यान
त्योहारी सीजन में कार या बाइक खरीदने के लिए लोन लेने की योजना है? जानिए EMI कितनी होनी चाहिए, लोन की अवधि बढ़ाने से ब्याज कैसे बढ़ता है और फिक्स्ड व फ्लोटिंग ब्याज दर में क्या अंतर है। प्रोसेसिंग फीस और दूसरे शुल्कों की जांच करके अपने बजट के अनुसार फैसला लें।
त्योहारी सीजन में कार या बाइक खरीदने का प्लान बना रहे हैं और इसके लिए लोन लेने की तैयारी है, तो सिर्फ आकर्षक ऑफर देखकर फैसला न करें। वाहन कंपनियों, डीलरों और बैंकों की ओर से त्योहारों के दौरान कई तरह के ऑफर दिए जाते हैं, जिसके चलते बड़ी संख्या में लोग इस समय वाहन खरीदते हैं। एक अनुमान के मुताबिक, पूरे साल होने वाली वाहन बिक्री में त्योहारी सीजन की हिस्सेदारी 25 से 30 प्रतिशत तक रहती है। ऐसे में लोन लेने से पहले अपनी मासिक आय, EMI, ब्याज दर और दूसरे शुल्कों का हिसाब लगाना जरूरी है। सही योजना से आप भविष्य में आर्थिक दबाव से बच सकते हैं।
1. EMI आपकी टेक होम सैलरी के 40% से ज्यादा न हो
वाहन लोन लेने से पहले यह देखना जरूरी है कि आपकी मासिक किस्त कितनी होगी और उसका आपकी आय पर कितना असर पड़ेगा। वित्तीय विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी व्यक्ति की कुल मासिक लोन किस्तें उसकी टेक होम सैलरी यानी हाथ में आने वाली कमाई के 40 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
इसलिए वाहन खरीदने से पहले अपनी मासिक आय, घर के खर्च और पहले से चल रहे लोन का आकलन करें। इसी आधार पर तय करें कि आप कितनी रकम का लोन आसानी से चुका सकते हैं। यदि मासिक किस्तें आय का बड़ा हिस्सा खर्च कर देंगी, तो रोजमर्रा के खर्चों को संभालना मुश्किल हो सकता है।
लोन की रकम तय करने के बाद डाउन पेमेंट पर भी ध्यान दें। डाउन पेमेंट वह राशि है, जो वाहन खरीदते समय लोन के अलावा अपनी जेब से देनी होती है। इसके लिए अपनी मौजूदा बचत का आकलन करें।
2. लोन की अवधि बढ़ाने से कितना बढ़ेगा ब्याज?
वाहन लोन की अवधि आमतौर पर पांच साल तक होती है, जिसे बढ़ाकर सात साल तक किया जा सकता है। लंबी अवधि चुनने पर हर महीने की EMI कम हो जाती है, लेकिन कुल ब्याज बढ़ जाता है। इसके उलट, कम अवधि के लोन में मासिक किस्त ज्यादा होती है, लेकिन कुल ब्याज कम देना पड़ता है।
इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि आप 8.4 प्रतिशत सालाना ब्याज दर पर पांच साल के लिए 10 लाख रुपये का लोन लेते हैं, तो दिए गए आंकड़ों के अनुसार कुल ब्याज 2,28,102 रुपये होगा। वहीं, लोन की अवधि छह साल करने पर ब्याज बढ़कर 2,76,502 रुपये हो जाएगा।
इस तरह सिर्फ एक साल अवधि बढ़ाने पर करीब 48 हजार रुपये अतिरिक्त ब्याज देना पड़ सकता है। इसलिए लोन की अवधि अपनी आय और मासिक भुगतान क्षमता के हिसाब से चुनें। कोशिश करें कि EMI बजट में रहे और ब्याज का बोझ भी अनावश्यक रूप से न बढ़े।
3. ब्याज दर बढ़ने की संभावना को भी समझें
वाहन लोन लेते समय सिर्फ मौजूदा ब्याज दर देखकर फैसला करना पर्याप्त नहीं है। यदि आप फ्लोटिंग ब्याज दर वाला लोन लेते हैं, तो भविष्य में दरों में बदलाव होने पर आपकी EMI या लोन की अवधि प्रभावित हो सकती है।
फिक्स्ड ब्याज दर वाले लोन में ब्याज दर पहले से तय रहती है और सामान्य तौर पर पूरी अवधि में समान रहती है। हालांकि, इसकी शुरुआती ब्याज दर फ्लोटिंग दर वाले लोन से ज्यादा हो सकती है। दूसरी ओर, फ्लोटिंग दर में ब्याज दर घट या बढ़ सकती है।
इसलिए लोन लेने से पहले दोनों विकल्पों की शर्तें समझें। केवल कम शुरुआती ब्याज दर देखकर फैसला न करें, बल्कि यह भी देखें कि भविष्य में दर बढ़ने पर आपकी आर्थिक स्थिति पर कितना असर पड़ेगा।
4. प्रोसेसिंग फीस और दूसरे शुल्क जरूर जांचें
वाहन लोन की लागत सिर्फ ब्याज तक सीमित नहीं होती। बैंक या वित्तीय संस्थान प्रोसेसिंग फीस, समय से पहले लोन चुकाने पर शुल्क और EMI में देरी होने पर जुर्माना भी लगा सकते हैं।
लोन लेने से पहले इन सभी शुल्कों की जानकारी लें। ज्यादा प्रोसेसिंग फीस से लोन की कुल लागत बढ़ सकती है। इसी तरह, समय से पहले भुगतान या किस्त में देरी से जुड़े शुल्क भी आपकी जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल सकते हैं।
इसलिए अलग-अलग बैंकों या वित्तीय संस्थानों के ऑफर की तुलना करते समय ब्याज दर के साथ सभी शुल्कों को भी ध्यान में रखें।
5. लोन लेने से पहले पूरे खर्च का हिसाब लगाएं
त्योहारी ऑफर और कम EMI देखकर वाहन खरीदने का फैसला करने से पहले यह समझना जरूरी है कि पूरी अवधि में आपको कितनी रकम चुकानी होगी। इसके लिए डाउन पेमेंट, हर महीने की EMI, कुल ब्याज और अन्य शुल्कों को एक साथ देखें।
अपनी आय और मौजूदा खर्चों को ध्यान में रखकर ही लोन की रकम तय करें। ऐसी किस्त चुनें, जिसे आप नियमित रूप से चुका सकें और जिसके कारण रोजमर्रा के जरूरी खर्च प्रभावित न हों।
