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CJP Protest: सरकार ने नहीं माना सुप्रीम कोर्ट का आदेश तो क्या होगा? जानें कितनी हो सकती है सजा, संविधान में क्या हैं नियम
 

 
 CJP Protest: सरकार ने नहीं माना सुप्रीम कोर्ट का आदेश तो क्या होगा? जानें कितनी हो सकती है सजा, संविधान में क्या हैं नियम
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नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। पार्टी ने रविवार, 11 अक्टूबर को सुबह 10 बजे जंतर-मंतर तक मार्च निकालने का आह्वान किया। इस आंदोलन का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी पार्टी के राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे को सौंपी गई है। शनिवार को हुए विरोध प्रदर्शन और पुलिस की कार्रवाई के बाद सीजेपी ने आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है। 

इस बीच दिल्ली में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई, आवाजाही पर प्रतिबंध और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन को लेकर संवैधानिक बहस तेज हो गई है। सवाल उठ रहा है कि यदि केंद्र या राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के किसी बाध्यकारी आदेश का पालन करने से इनकार कर दे, तो क्या होगा? क्या संबंधित अधिकारियों को जेल जाना पड़ सकता है और क्या सरकार अदालत के फैसले को मानने से इनकार कर सकती है?

सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानना क्यों जरूरी है?

भारतीय संविधान में सुप्रीम कोर्ट को देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था का दर्जा प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 141 स्पष्ट करता है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून देश के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होगा। वहीं, अनुच्छेद 144 के तहत देश के सभी नागरिक और न्यायिक प्राधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट की सहायता में कार्य करना होता है।

हालांकि, अनुच्छेद 141 मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून से संबंधित है। किसी विशेष न्यायिक आदेश का पालन किसे करना है और उसका कानूनी प्रभाव क्या होगा, यह आदेश की प्रकृति, उसकी शर्तों तथा संबंधित पक्षों पर निर्भर करता है।

सरकार ने आदेश नहीं माना तो सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?

संविधान का अनुच्छेद 129 सुप्रीम कोर्ट को अपने आदेशों की अवमानना के मामलों में दंड देने की शक्ति प्रदान करता है। वहीं, अनुच्छेद 142 अदालत को किसी लंबित मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी करने का अधिकार देता है।

यदि कोई सरकारी अधिकारी जानबूझकर अदालत के बाध्यकारी आदेश का उल्लंघन करता है, तो सुप्रीम कोर्ट मामले की परिस्थितियों की जांच कर सकता है। अदालत संबंधित अधिकारियों से जवाब मांग सकती है और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश भी दे सकती है। 

कोर्ट की अवमानना क्या होती है?

अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 के तहत अदालत की अवमानना को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है—सिविल अवमानना और आपराधिक अवमानना।

सिविल अवमानना में अदालत के किसी फैसले, आदेश, निर्देश या रिट की जानबूझकर अवहेलना करना शामिल है। अदालत को दिए गए वचन का जानबूझकर उल्लंघन भी इसी श्रेणी में आ सकता है।

हालांकि, किसी आदेश को लागू करने में देरी होना या प्रशासनिक कारणों से उसका पालन न हो पाना अपने आप में अवमानना नहीं माना जाता। अदालत यह देखती है कि संबंधित व्यक्ति को आदेश की जानकारी थी या नहीं, उसका पालन संभव था या नहीं और उल्लंघन जानबूझकर किया गया या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना पर कितनी हो सकती है सजा?

अवमानना न्यायालय अधिनियम, 1971 की धारा 12 के अनुसार, अदालत की अवमानना सिद्ध होने पर छह महीने तक की साधारण कैद, दो हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।

हालांकि, हर मामले में जेल या जुर्माना लगना अनिवार्य नहीं है। सजा का निर्धारण अदालत संबंधित परिस्थितियों, उल्लंघन की गंभीरता और जिम्मेदार व्यक्ति की भूमिका को ध्यान में रखकर करती है। कानून में अदालत की संतुष्टि के अनुसार माफी स्वीकार करने का भी प्रावधान है। 

क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदल सकती है?

केंद्र या राज्य सरकार केवल इसलिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकती कि वह उसके फैसले से असहमत है। हालांकि, किसी निर्णय के कानूनी आधार को बदलने के लिए विधायिका संविधान के दायरे में नया कानून बना सकती है या मौजूदा कानून में संशोधन कर सकती है।

लेकिन केवल कानून बनाकर किसी बाध्यकारी न्यायिक आदेश को सीधे निष्प्रभावी करना संवैधानिक जांच के दायरे में आ सकता है। सरकार संबंधित आदेश के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया के तहत पुनर्विचार या अन्य उपलब्ध उपाय अपना सकती है।

जब तक आदेश पर रोक नहीं लगाई जाती, उसमें संशोधन नहीं होता या उसे सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के तहत निरस्त नहीं किया जाता, तब तक संबंधित पक्षों को उसका पालन करना आवश्यक होता है।

CJP के प्रदर्शन के बीच क्यों अहम हुआ संवैधानिक सवाल?

दिल्ली में 10 अक्टूबर को हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने और सार्वजनिक आवाजाही पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर विवाद बढ़ा है। सीजेपी ने इन कार्रवाइयों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताते हुए सरकार की आलोचना की है। वहीं, प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था बनाए रखने को सुरक्षा उपायों का आधार बताया गया है।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन का सवाल महत्वपूर्ण हो गया है। हालांकि, किसी खास सरकारी कार्रवाई को अदालत की अवमानना माना जाएगा या नहीं, इसका अंतिम निर्णय संबंधित न्यायिक आदेश, उपलब्ध साक्ष्यों और अदालत की सुनवाई पर निर्भर करेगा।