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जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी पर बयान से विवाद, इस्लामी संगठन ने एनसी विधायक की आलोचना की

 
जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी पर बयान से विवाद, इस्लामी संगठन ने एनसी विधायक की आलोचना की
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Srinagar : जम्मू-कश्मीर में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव को लेकर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। इस बीच इस्लामी विद्वानों और धर्मगुरुओं के संगठन मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) ने मंगलवार को सत्ताधारी दल जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक विधायक के बयान की कड़ी आलोचना की।

एमएमयू के प्रवक्ता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा के बाहर पत्रकारों से बातचीत में एनसी विधायक और पूर्व न्यायाधीश हसनैन मसूदी के बयान पर आपत्ति जताई। मसूदी ने कथित तौर पर केंद्र शासित प्रदेश में शराब की बिक्री को उससे मिलने वाले राजस्व के आधार पर सही ठहराया था।

इस्लाम में नशीली चीजों पर रोक: मीरवाइज

मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने कहा कि इस तरह के बयान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं, खासकर तब जब इस्लाम में नशीली चीजों पर स्पष्ट रूप से रोक है। उन्होंने कहा कि यह इस्लाम के मूल्यों और मान्यताओं के विपरीत है और शराब के सेवन से परिवारों व समाज पर पड़ने वाले गंभीर सामाजिक प्रभावों को नजरअंदाज करता है।

उनके अनुसार, शराब की वजह से घरेलू कलह, आर्थिक तंगी और नैतिक गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी राजनीतिक दल की ओर से राजस्व के आधार पर शराब को सही ठहराना चिंताजनक है।

आर्थिक हित बनाम सामाजिक जिम्मेदारी

एमएमयू ने कहा कि आर्थिक लाभ को नैतिक, सामाजिक और मानवीय हितों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। संगठन ने इसे शासन के प्रति एक चिंताजनक दृष्टिकोण बताया और कहा कि राजस्व के नाम पर शराब को सही ठहराना उचित नहीं है।

नेशनल कॉन्फ्रेंस से रुख स्पष्ट करने की मांग

संगठन ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए जम्मू और कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस से अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की है। साथ ही, जम्मू-कश्मीर में शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने और इसकी तस्करी में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग भी की गई है।

गौरतलब है कि जम्मू और कश्मीर विधानसभा में एक निजी सदस्य द्वारा पेश किए गए विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है, जिसमें केंद्र शासित प्रदेश में शराब की बिक्री और खरीद पर रोक लगाने की मांग की गई है। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में शराब की बिक्री और खरीद ब्रिटिश शासनकाल से ही कानूनी रही है।