राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कैंपेन के जवाब में आई ‘झूठ की गूंज’ वेबसाइट, 40 दावों के फैक्ट-चेक का दावा
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कैंपेन के बीच ‘झूठ की गूंज’ नाम की एक वेबसाइट चर्चा में आ गई है। वेबसाइट राहुल गांधी के कैंपेन के दौरान किए गए दावों का फैक्ट-चेक करने का दावा कर रही है। हालांकि, वेबसाइट को किसने बनाया है, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
वेबसाइट पर मौजूद कंटेंट के आधार पर इसे राहुल गांधी और कांग्रेस की आलोचना करने वाले समूहों से जुड़ा बताया जा रहा है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों के बीच वेबसाइट को लेकर चर्चा है, लेकिन बीजेपी ने इससे किसी भी तरह के संबंध से इनकार किया है।
राहुल गांधी के 40 दावों की जांच का दावा
‘झूठ की गूंज’ वेबसाइट के मुताबिक, राहुल गांधी ने ‘छात्रों की गूंज’ कैंपेन के चार कार्यक्रमों के दौरान कुल 40 दावे किए। वेबसाइट का दावा है कि इनमें से 29 दावे गलत और 11 गुमराह करने वाले थे।
वेबसाइट पर लिखा गया है कि इन दावों की जांच के लिए अलग-अलग सरकारी और आधिकारिक आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, वेबसाइट के दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
रोजगार के आंकड़ों पर भी उठाए सवाल
वेबसाइट ने राहुल गांधी के उस दावे को भी चुनौती दी है, जिसमें उन्होंने रोजगार की तलाश कर रहे 1,000 युवाओं में से करीब 36 को स्थायी नौकरी मिलने की बात कही थी। उनके मुताबिक लगभग 300 युवा बेरोजगार रहेंगे, जबकि करीब 700 गिग वर्कर बनेंगे।
‘झूठ की गूंज’ वेबसाइट ने इसके जवाब में PLFS के यूनिट-लेवल डेटा का हवाला देते हुए दावा किया है कि 2025 में 15 से 29 वर्ष की उम्र के प्रत्येक 100 ग्रेजुएट युवाओं में करीब 26 के पास वेतन वाली नौकरी थी।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा के आंकड़ों पर भी विवाद
वेबसाइट ने राहुल गांधी के महिलाओं के खिलाफ शारीरिक हिंसा से जुड़े दावे पर भी सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी ने करीब 29 प्रतिशत महिलाओं के शारीरिक हिंसा का सामना करने की बात कही थी।
इसके जवाब में वेबसाइट ने NFHS के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया है कि जीवनसाथी द्वारा की जाने वाली शारीरिक और/या यौन हिंसा के मामलों में कमी आई है। वेबसाइट के अनुसार, यह आंकड़ा 2005-06 में 37.2 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 22.3 प्रतिशत हो गया।
सोशल मीडिया पर वेबसाइट की चर्चा
वेबसाइट के लॉन्च होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस शुरू हो गई है। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स इसे ‘राष्ट्रवादी रिसर्चर्स’ और Gen Z से जुड़े लोगों की पहल बता रहे हैं। हालांकि, वेबसाइट के वास्तविक संचालकों की पहचान अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।
