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भूख हड़ताल से सरकारों तक पहुंची आवाज, गांधी से सोनम वांगचुक तक... जब अनशन बना जनआंदोलन का हथियार
 

 
 भूख हड़ताल से सरकारों तक पहुंची आवाज, गांधी से सोनम वांगचुक तक... जब अनशन बना जनआंदोलन का हथियार
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नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल के 21वें दिन, 18 जुलाई को एक्टिविस्ट और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस मेडिकल देखरेख के लिए अपने साथ ले गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, स्वास्थ्य संबंधी कारणों के चलते उन्हें अस्पताल ले जाया गया। वांगचुक नीट यूजी पेपर लीक मामले को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करते हुए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं।

सोनम वांगचुक के अनशन के बाद भारतीय राजनीति में भूख हड़ताल की भूमिका एक बार फिर चर्चा में है। देश के इतिहास में कई ऐसे मौके आए हैं, जब भूख हड़ताल ने जनमत को प्रभावित किया और सरकारों को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया।

गांधी ने भूख हड़ताल को बनाया सत्याग्रह का हथियार

महात्मा गांधी ने भूख हड़ताल को सत्याग्रह के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने इसे बिना हिंसा के न्याय की मांग करने का नैतिक माध्यम बनाया। 1918 में अहमदाबाद मिल श्रमिकों की हड़ताल के दौरान गांधी ने कपड़ा श्रमिकों के लिए उचित वेतन की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी। इसके बाद मिल मालिकों को श्रमिकों की मांगों पर सहमति देनी पड़ी।

1932 में गांधी ने ब्रिटिश सरकार के कम्युनल अवॉर्ड के खिलाफ यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया। इसमें दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र का प्रस्ताव था। यह अनशन आगे चलकर गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच ऐतिहासिक पूना पैक्ट का कारण बना।

विभाजन के बाद 1947-48 में गांधी ने कोलकाता और दिल्ली में सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने और हिंसा रोकने के लिए भी भूख हड़ताल की।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की 116 दिन की जेल भूख हड़ताल

स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ समान व्यवहार की मांग को लेकर लाहौर जेल में लंबी भूख हड़ताल की। दोनों ने बेहतर भोजन, जेल की स्थिति में सुधार और ब्रिटिश कैदियों के समान अधिकारों की मांग की। उनके विरोध को देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिला और ब्रिटिश प्रशासन पर दबाव बढ़ा।

पोटी श्रीरामुलु के बलिदान से बना आंध्र प्रदेश

आजादी के बाद पोटी श्रीरामुलु ने तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। दिसंबर 1952 में 58 दिनों के अनशन के बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद बड़े पैमाने पर जनविरोध हुआ और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 1953 में आंध्र प्रदेश के गठन की घोषणा करनी पड़ी। आंध्र प्रदेश भाषाई आधार पर बनने वाला भारत का पहला राज्य बना।

लद्दाख के लिए सोनम वांग्याल का अनशन

1984 में लद्दाख के प्रमुख नेता और सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल ने लद्दाख के समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग को लेकर पांच दिन का अनशन किया था। आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लेह का दौरा किया और उन्हें अनशन समाप्त करने के लिए मनाया। बाद में लद्दाख के लिए अनुसूचित जनजाति की मांग ने राजनीतिक रूप से लगातार जोर पकड़ा।

ममता बनर्जी और मेधा पाटकर का अनशन

2006 में ममता बनर्जी ने सिंगुर में टाटा नैनो प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण के विरोध में 26 दिनों तक भूख हड़ताल की। यह आंदोलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हुआ।

वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान 20 दिनों का अनशन किया। उन्होंने सरदार सरोवर बांध परियोजना से विस्थापित परिवारों के उचित पुनर्वास की मांग उठाई।

अन्ना हजारे के अनशन ने खड़ा किया देशव्यापी आंदोलन

2011 में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली अनशनों में गिना जाता है। जन लोकपाल बिल की मांग को लेकर उनके अनिश्चितकालीन अनशन ने देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया। बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे और तत्कालीन यूपीए सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बना।

सोनम वांगचुक का अनशन फिर चर्चा में

सोनम वांगचुक ने 2024 में लद्दाख के पर्यावरण संरक्षण, राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग को लेकर 21 दिन का क्लाइमेट फास्ट किया था।

अब जुलाई 2026 में वह जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर रहे हैं। वांगचुक नीट यूजी परीक्षा में कथित अनियमितताओं का विरोध कर रहे छात्रों के समर्थन में यह आंदोलन कर रहे हैं। 21वें दिन मेडिकल कारणों से पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल ले जाने के बाद एक बार फिर यह सवाल चर्चा में है कि क्या आज भी भूख हड़ताल सरकारों और समाज का ध्यान खींचने का सबसे प्रभावी लोकतांत्रिक हथियार बनी हुई है।