Global South क्या है और क्यों है इतना अहम? BRICS Summit से समझिए भारत का बड़ा एजेंडा
What is Global South: नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को आयोजित 18वें BRICS Summit के दौरान ‘Global South’ एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में रहा। भारत ने 2026 में BRICS की अध्यक्षता करते हुए विकासशील देशों की वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। नई दिल्ली घोषणापत्र में भी विकासशील देशों की भूमिका बढ़ाने और संयुक्त राष्ट्र समेत वैश्विक संस्थाओं में सुधार का समर्थन किया गया है।
लेकिन आखिर Global South क्या है? इसमें कौन से देश आते हैं और BRICS के लिए इसकी अहमियत क्यों बढ़ रही है? इसे समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि आज दुनिया की आर्थिक ताकत का बड़ा हिस्सा उन देशों के पास है, जिन्हें पारंपरिक तौर पर विकासशील या उभरती अर्थव्यवस्थाओं के तौर पर देखा जाता है।
Global South क्या है?
‘Global South’ कोई निश्चित भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। आम तौर पर इस शब्द का इस्तेमाल एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन के विकासशील और उभरते देशों के लिए किया जाता है। हालांकि, इस समूह के कई देश भौगोलिक रूप से उत्तरी गोलार्ध में भी स्थित हैं।
इसलिए Global South को केवल नक्शे के आधार पर समझना सही नहीं होगा। यह शब्द मुख्य रूप से देशों के आर्थिक विकास, वैश्विक संस्थाओं में प्रभाव, ऐतिहासिक अनुभव और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उनकी स्थिति को दर्शाता है।
यह भी जरूरी है कि Global South को एक समान राजनीतिक या आर्थिक समूह न माना जाए। भारत, चीन, ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों की विदेश नीति और आर्थिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। इसके बावजूद कई देशों की एक साझा चिंता है—वैश्विक फैसले लेने वाली संस्थाओं में उनकी भूमिका उनकी मौजूदा आर्थिक और जनसांख्यिकीय ताकत के मुताबिक हो।
Global South इतना अहम क्यों हो गया है?
Global South की बढ़ती अहमियत का सबसे बड़ा कारण इसकी आर्थिक ताकत है। UN Trade and Development यानी UNCTAD के मुताबिक, 2023 में Global South की हिस्सेदारी दुनिया की GDP में करीब 42 फीसदी, वैश्विक सामान निर्यात में 44 फीसदी और वैश्विक FDI inflows में करीब 65 फीसदी थी।
2025 की UNCTAD रिपोर्ट के मुताबिक भी Global South की अर्थव्यवस्थाएं दुनिया के कुल उत्पादन का 40 फीसदी से ज्यादा और वैश्विक merchandise trade का करीब आधा हिस्सा रखती हैं। इसके बावजूद वैश्विक वित्तीय बाजारों और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उसका प्रभाव उसकी आर्थिक ताकत के मुकाबले सीमित है।
यही वजह है कि Global South के देशों की मांग अब सिर्फ ज्यादा प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका बढ़े।
दूसरे शब्दों में कहें तो विकासशील देश अब केवल ‘rule-takers’ यानी बनाए गए नियमों का पालन करने वाले नहीं रहना चाहते, बल्कि ‘rule-shapers’ यानी नियमों को तय करने की प्रक्रिया में भूमिका निभाना चाहते हैं।
BRICS में Global South की भूमिका क्या है?
BRICS Global South के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभरा है। इसकी शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी। बाद में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ और हाल के विस्तार के बाद समूह में 11 सदस्य हैं—ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और UAE।
भारत सरकार के मुताबिक, मौजूदा BRICS सदस्य दुनिया की करीब 49.5 फीसदी आबादी, 40 फीसदी GDP और 26 फीसदी वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
BRICS की खासियत यह है कि इसमें ऐसे देश शामिल हैं जिनकी राजनीतिक और भू-राजनीतिक प्राथमिकताएं कई मामलों में एक-दूसरे से अलग हैं। इसके बावजूद वैश्विक आर्थिक व्यवस्था, विकास, व्यापार, वित्त और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर उनके बीच कई साझा चिंताएं हैं।
यही कारण है कि BRICS को Global South की सामूहिक आवाज को मजबूत करने वाले प्रमुख मंचों में गिना जाता है।
Global South के देश क्या चाहते हैं?
नई दिल्ली में हुए BRICS Summit और New Delhi Declaration में Global South से जुड़े कई मुद्दे सामने आए। इनमें प्रमुख रूप से चार बातें महत्वपूर्ण हैं।
1. वैश्विक संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व
BRICS देशों ने संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद समेत वैश्विक संस्थाओं में व्यापक सुधार की जरूरत दोहराई। घोषणापत्र में विकासशील देशों की प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाने की बात कही गई है।
भारत और ब्राजील की बड़ी भूमिका की आकांक्षा का चीन और रूस ने भी समर्थन किया। घोषणापत्र में UNSC सुधार को Global South की आवाज मजबूत करने से जोड़ा गया है।
2. वैश्विक व्यापार में मजबूत आवाज
Global South के कई देश एकतरफा टैरिफ, संरक्षणवादी नीतियों और आर्थिक दबाव को लेकर चिंता जताते रहे हैं।
BRICS के New Delhi Declaration में एकतरफा व्यापारिक और आर्थिक उपायों को लेकर चिंता जाहिर की गई है। विकासशील देशों का तर्क है कि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के फैसलों का असर उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर disproportionately नहीं पड़ना चाहिए।
3. वित्तीय व्यवस्था में ज्यादा विकल्प
BRICS फिलहाल किसी एक साझा मुद्रा को लागू करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा है। इसके बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान व्यवस्था और भुगतान प्रणालियों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी जैसे विकल्पों पर जोर है।
इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विकल्प बढ़ाना और भुगतान व्यवस्था को अधिक सुविधाजनक बनाना है। New Delhi Declaration में स्थानीय मुद्राओं और cross-border payment cooperation को भी महत्व दिया गया है।
4. टेक्नोलॉजी तक बेहतर पहुंच
AI, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वांटम टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और दूसरी उभरती तकनीकें भी BRICS के एजेंडे में तेजी से महत्वपूर्ण हुई हैं।
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान टेक्नोलॉजी सहयोग को विकास और Global South की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया। इसका उद्देश्य यह है कि नई तकनीकों का लाभ केवल विकसित अर्थव्यवस्थाओं तक सीमित न रहे, बल्कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं में भी उनका इस्तेमाल बढ़े।
Global South के लिए भारत की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत ने Global South के मुद्दों को केवल पश्चिमी देशों के विकल्प के तौर पर पेश नहीं किया। भारत का जोर मौजूदा वैश्विक संस्थाओं में सुधार और जरूरत के हिसाब से नए सहयोगी तंत्र विकसित करने पर रहा है।
यानी भारत का संदेश यह रहा है कि दुनिया को एक नए गुट में बांटने के बजाय मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और संतुलित बनाया जाए।
नई दिल्ली घोषणापत्र में भी BRICS देशों ने अधिक प्रतिनिधित्व वाली और निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए समर्थन दोहराया है। साथ ही UN Security Council में विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने की बात कही गई है।
भारत के लिए यह भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह खुद Global South की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और लंबे समय से UN, IMF, World Bank जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है।
भारत ने BRICS अध्यक्षता में क्या पहल की?
भारत ने BRICS की अध्यक्षता के दौरान केवल राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय सहयोग को व्यावहारिक पहलों से जोड़ने की कोशिश की।
इनमें BRICS MSME Portal, Startup Innovation Fund, Digital Public Infrastructure पर सहयोग और नई तकनीकों में साझेदारी जैसे प्रयास शामिल हैं। AI, क्वांटम टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड सैटेलाइट टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारतीय नवाचारों को भी BRICS मंच पर प्रदर्शित किया गया।
भारत ने BRICS के एजेंडे में supply chains, critical minerals, technology और development finance जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता दी। इससे यह संकेत मिलता है कि Global South का एजेंडा अब केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि व्यापार, तकनीक, वित्त, ऊर्जा और विकास से सीधे जुड़ चुका है।
Global South की बढ़ती ताकत का मतलब क्या है?
Global South की बढ़ती आर्थिक ताकत ने वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव पैदा किया है। दुनिया की अर्थव्यवस्था में इन देशों का हिस्सा लगातार बढ़ा है, लेकिन वैश्विक वित्तीय और राजनीतिक संस्थाओं में उनकी भागीदारी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।
BRICS का विस्तार और नई दिल्ली में हुआ शिखर सम्मेलन इसी बदलाव की एक तस्वीर पेश करता है। हालांकि BRICS के सभी देशों के हित एक जैसे नहीं हैं और कई मुद्दों पर उनके बीच गंभीर मतभेद भी हैं, फिर भी वे वैश्विक शासन व्यवस्था में अधिक संतुलन और विकासशील देशों की बड़ी भूमिका की मांग को एक साझा मंच दे रहे हैं।
