कैसे बनता है भारत का तिरंगा? हाथ से कताई से लेकर सिलाई तक, 6 चरणों में पूरी प्रक्रिया
New Delhi : हर साल 26 जनवरी को लाल किले पर फहराया जाने वाला तिरंगा सिर्फ एक झंडा नहीं, बल्कि देश की आन-बान-शान का प्रतीक है। इसकी कीमत 6,500 रुपये होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह तिरंगा कितने चरणों में बनता है? खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) के तहत लाइसेंस प्राप्त कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संघ संघ (KKGSSF) में यह पूरी प्रक्रिया हाथ से की जाती है। तिरंगा बनाने में कुल 6 मुख्य चरण होते हैं।
तिरंगा बनाने के 6 चरण
- हाथ से कताई (Hand Spinning) : सबसे पहले खादी सूत तैयार किया जाता है। यह काम पूरी तरह हाथ से किया जाता है। खादी सूत की खासियत यह है कि यह मजबूत और टिकाऊ होता है।
- बुनाई (Weaving) : कते हुए सूत से कपड़ा बुना जाता है। यह काम भी हाथ से किया जाता है। कपड़े की लंबाई और चौड़ाई फ्लैग कोड के अनुसार तय होती है।
- रंगाई (Dyeing) : कपड़े को तीन रंगों में रंगा जाता है – केसरिया (सैफ्रन), सफेद और हरा। रंगों का इस्तेमाल ISI मानकों के अनुसार होता है। नीले अशोक चक्र के लिए विशेष डिजाइन तैयार किया जाता है।
- चक्र की छपाई (Ashoka Chakra Printing) : सफेद पट्टी पर 24 स्पोक्स वाला नीला अशोक चक्र हाथ से या मशीन से छापा जाता है। यह सबसे नाजुक काम होता है।
- सिलाई (Stitching) : तीनों रंगों की पट्टियों को सिलकर जोड़ा जाता है। सिलाई मजबूत धागे से की जाती है ताकि झंडा हवा में फहराते समय फटे नहीं।
- बंधाई और फिनिशिंग (Finishing & Packing) : अंत में झंडे के किनारों पर मजबूत हेमिंग की जाती है और लाल किले जैसे हाई मास्ट के लिए विशेष रस्सी लगाई जाती है।
अलग-अलग आकार के तिरंगे की कीमत
- लाल किले पर फहराया जाने वाला तिरंगा (21×14 फीट): 6,500 रुपये
- हाई मास्ट पर लगने वाला बड़ा झंडा (उदाहरण के लिए): 17,800 रुपये
- मंत्रियों की कारों में लगने वाला तिरंगा: 300 रुपये
- टेबल पर लगने वाला छोटा तिरंगा: 200 रुपये
फ्लैग कोड ऑफ इंडिया के सख्त नियम
फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002 के तहत राष्ट्र ध्वज का आकार 3:2 (आयताकार) होना अनिवार्य है। रंग, धागे की मजबूती, सूत की क्वालिटी और सिलाई में किसी तरह की गलती नहीं हो सकती। उल्लंघन पर सजा और जुर्माना दोनों हो सकता है।
कहां बनता है असली तिरंगा?
केवीआईसी से लाइसेंस प्राप्त इकाइयां ही असली तिरंगा बना सकती हैं। कर्नाटक में कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संघ संघ (KKGSS) इसका प्रमुख केंद्र है। यह 2004 से राष्ट्रध्वज बना रहा है। इसका मुख्यालय हुबली में 17 एकड़ में फैला हुआ है। संघ के पहले चेयरमैन वेंकटेश टी मगादी थे।
क्यों है खास?
तिरंगा सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि देश की भावनाओं का प्रतीक है। इसे बनाने में हाथ की मेहनत और भावनाएं जुड़ी होती हैं। हर साल गणतंत्र दिवस पर लाल किले पर फहराया जाने वाला तिरंगा इसी तरह हाथ से बनाया जाता है। यह प्रक्रिया न केवल तकनीकी है, बल्कि भावनात्मक भी। क्योंकि तिरंगा बनाना एक कला है, जो देशभक्ति से जुड़ी है।
