ईरान संकट के बीच भारत अलर्ट: रूस-अमेरिका से बढ़ेगी तेल खरीद, 8 हफ्तों का भंडार तैयार
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत ने कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक रणनीति पर काम तेज कर दिया है। सरकार रूस के साथ-साथ अमेरिका से भी अधिक तेल खरीदने के विकल्पों पर सक्रिय बातचीत कर रही है, ताकि खाड़ी क्षेत्र में संभावित व्यवधान का असर घरेलू बाजार पर न्यूनतम रहे।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भरोसा दिलाया है कि देश के पास पेट्रोलियम उत्पादों का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। मंत्रालय ने देशभर में आपूर्ति और स्टॉक की स्थिति पर नजर रखने के लिए 24x7 कंट्रोल रूम स्थापित किया है। युद्ध लंबा खिंचने की स्थिति में आपातकालीन उपायों पर भी चरणबद्ध तैयारी की जा रही है।
पुरी ने कहा, “भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक, चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और पांचवां सबसे बड़ा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यातक है। बीते वर्षों में हमने ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाकर उपलब्धता और कीमतों को संतुलित रखा है। देश के पास पर्याप्त कच्चे तेल और पेट्रोल, डीजल व एटीएफ जैसे उत्पादों का भंडार है, जिससे अल्पकालिक व्यवधानों से निपटा जा सकता है।”
सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के पास कुल आठ सप्ताह का रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडार है। इसमें चार सप्ताह का पेट्रोल-डीजल स्टॉक और चार सप्ताह का कच्चा तेल शामिल है। ऊर्जा विश्लेषण संस्था केपलर का अनुमान है कि भारत के पास लगभग 10 करोड़ बैरल कच्चे तेल का भंडार है। यदि होरमुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होती है तो यह स्टॉक देश की जरूरतों को 40-45 दिनों तक पूरा कर सकता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत आपूर्ति होरमुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती है। यह मार्ग तेल कंपनियों के लिए लागत और समय की दृष्टि से अनुकूल माना जाता है। मौजूदा ईरान संकट के कारण इस मार्ग पर अनिश्चितता बढ़ी है, जिससे वैश्विक बाजार में अस्थिरता देखी जा रही है।
अधिकारियों के मुताबिक भारतीय तेल कंपनियां रूस और अमेरिका दोनों के संपर्क में हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है। हालांकि नई परिस्थितियों में छूट कम हो सकती है, लेकिन रूस आपूर्ति बढ़ाने की स्थिति में है। उधर, डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ओर से पहले भी भारत पर रूस से तेल खरीद कम करने और अमेरिका से बढ़ाने का दबाव रहा है। भारत ने अमेरिका से आयात बढ़ाया है और इसमें और वृद्धि की संभावना है।
हालिया संकट के बाद वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है, जो ईरान संकट की शुरुआत के बाद लगभग 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है। ऊंची कीमतों का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है। 31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष में भारत ने कच्चे तेल के आयात पर 137 अरब डॉलर खर्च किए थे। वहीं चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले दस महीनों (अप्रैल 2025 से जनवरी 2026) में 206.3 मिलियन टन कच्चे तेल के आयात पर 100.4 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं तो भारत को अपनी आपूर्ति रणनीति में और तेजी से विविधता लानी होगी, ताकि घरेलू बाजार में कीमतों और उपलब्धता पर नियंत्रण बनाए रखा जा सके।
