भारत बना रहा ‘ड्रोन आर्मी’: 50 हजार जवानों की फोर्स होगी तैयार, हर सैन्य हमले में सबसे पहले करेगी जवाबी कार्रवाई
नई दिल्ली। ऑपरेशन सिंदूर, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-इजराइल-ईरान संघर्ष से मिले अनुभवों के बाद भारत अब भविष्य की जंग के लिए अपनी सैन्य रणनीति तेजी से बदल रहा है। भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान ने अब एक विशेष ‘ड्रोन फोर्स’ तैयार करने का फैसला लिया है, जो किसी भी सैन्य कार्रवाई में ‘फर्स्ट रेस्पोंडर’ यानी पहली जवाबी ताकत के रूप में काम करेगी।
इंटीग्रेटेड रक्षा मुख्यालय के अनुसार इस नई फोर्स के लिए फिलहाल करीब 50 हजार सैन्य कर्मियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। अगले तीन वर्षों में देशभर में 15 नए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बनाए जाएंगे, जहां सैनिकों को सिम्युलेटर और वर्चुअल रियलिटी के जरिए रीयल-टाइम युद्ध प्रशिक्षण दिया जाएगा।
रक्षा सूत्रों के मुताबिक भविष्य में BSF और ITBP जैसे सुरक्षा बलों को भी इस नेटवर्क से जोड़ा जाएगा। यह फोर्स इंटेलिजेंस, सर्विलांस और सटीक हमले की दोहरी भूमिका निभाएगी। इसके लिए वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड और सेना के ‘आकाशतीर’ सिस्टम का तकनीकी कवच भी मिलेगा।
पाकिस्तान के ड्रोन हमले से मिला सबक
ड्रोन फोर्स की अवधारणा पिछले वर्ष उस समय सामने आई, जब पाकिस्तान ने करीब 1,000 ड्रोन के जरिए भारत की सुरक्षा तैयारियों को परखने की कोशिश की थी। इन हमलों का मकसद भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम की कमजोरियों का पता लगाना और महंगे मिसाइल डिफेंस सिस्टम को सस्ते ड्रोन के जरिए आर्थिक नुकसान पहुंचाना था।
इसी अनुभव के बाद अब भारत ‘सॉफ्ट किल’ और ‘हार्ड किल’ तकनीकों पर तेजी से काम कर रहा है। सॉफ्ट किल में जैमिंग और स्पूफिंग जैसी तकनीकें शामिल हैं, जबकि हार्ड किल में लेजर आधारित डायरेक्टेड एनर्जी वेपन का इस्तेमाल किया जाएगा।
हर फौजी के पास होगा अपना ड्रोन
भारतीय सेना की योजना है कि हर जवान को ड्रोन संचालन की बेसिक ट्रेनिंग दी जाए ताकि युद्ध के मैदान में प्रत्येक सैनिक के पास अपना व्यक्तिगत ड्रोन हो। इसके अलावा सेना की हर कोर में लगभग 8,000 ड्रोन शामिल करने की तैयारी है। इस तरह भविष्य में एक लाख ड्रोन की विशाल सैन्य ताकत तैयार की जाएगी।
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ी
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने रक्षा उत्पादन में बड़ी छलांग लगाई है। देश का रक्षा उत्पादन 1.54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इस वर्ष करीब 120 नए डिफेंस स्टार्टअप शुरू हुए हैं, जिनमें से 20 कंपनियां केवल ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीक पर काम कर रही हैं।
करीब 16 हजार MSME इन कंपनियों को तकनीकी सहायता दे रहे हैं। वहीं 7.85 लाख करोड़ रुपये के रक्षा बजट का 75 प्रतिशत हिस्सा अब देश के भीतर ही खर्च किया जा रहा है। इसके चलते भारत का रक्षा आयात भी 11 से 15 प्रतिशत तक घटा है।
अब भारत में बन रहे मिसाइलों के ‘दिल-दिमाग’
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अब भारत मिसाइलों के अहम सेंसर यानी सीकर्स और इंजन जैसी अत्याधुनिक तकनीक भी खुद विकसित कर रहा है। पीटीसी इंडस्ट्रीज, डेटा पैटर्न्स और सोलर इंडस्ट्रीज जैसी भारतीय कंपनियां इसमें अहम भूमिका निभा रही हैं।
पहले ये महत्वपूर्ण हिस्से रूस से आयात किए जाते थे, लेकिन अब ब्रह्मोस मिसाइल में स्वदेशी पुर्जों की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत से बढ़कर 72 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
राफेल की मीका मिसाइलों का रखरखाव अब भारत में
इस बीच यूरोपीय रक्षा कंपनी MBDA और भारतीय वायुसेना के बीच एक अहम समझौता हुआ है। इसके तहत राफेल लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल होने वाली मीका एयर-टू-एयर मिसाइलों का रखरखाव अब भारत में ही किया जाएगा।
देश में इनके ‘मेंटेनेंस, रिपेयर और मिड-लाइफ ओवरहॉल’ की सुविधा विकसित की जाएगी। यह समझौता भारत द्वारा प्रस्तावित 114 अतिरिक्त मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की खरीद से पहले बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अगली जंग होगी मल्टी-डोमेन वॉर
एयर कमोडोर गौरव एम त्रिपाठी (सेवानिवृत्त) के मुताबिक भविष्य के युद्ध ‘मल्टी-डोमेन’ होंगे, जिनमें अंतरिक्ष से लेकर समुद्र तक हर क्षेत्र में एक साथ कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य के ड्रोन इतने उन्नत हो सकते हैं कि उन्हें जैम करना बेहद मुश्किल होगा।
ये ड्रोन बिना GPS के भी काम कर सकेंगे और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल होमिंग तथा स्वार्म अटैक जैसी तकनीकों से लैस होंगे। ऐसे में भारत को अपनी एंटी-ड्रोन क्षमता सभी महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों तक फैलानी होगी और कम्युनिकेशन सिस्टम को साइबर व इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर से सुरक्षित बनाना होगा।
