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भारत-रूस का गुप्त सैन्य समझौता उजागर, RELOS से बदल सकता है दुनिया का पावर बैलेंस 

 
भारत-रूस का गुप्त सैन्य समझौता उजागर, RELOS से बदल सकता है दुनिया का पावर बैलेंस
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New Delhi/Moscow : मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत और रूस के बीच हुए अहम सैन्य समझौते RELOS (Reciprocal Exchange of Logistics Support) को लेकर अब नई जानकारी सामने आई है। इस समझौते को रूस ने सार्वजनिक किया है, जिसके बाद इसकी रणनीतिक अहमियत और स्पष्ट हो गई है।

रक्षा सहयोग को नई मजबूती

इस समझौते के तहत भारत और रूस एक-दूसरे के क्षेत्र में अपनी सेना, युद्धपोत और सैन्य विमान तैनात कर सकेंगे। इसे दोनों देशों के रक्षा संबंधों में बड़ा कदम माना जा रहा है। समझौते के अनुसार, दोनों देश अधिकतम 3,000 सैनिक, 5 युद्धपोत और 10 सैन्य विमान तक एक-दूसरे के ठिकानों पर तैनात कर सकते हैं।

वैश्विक स्तर पर रणनीतिक असर

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह समझौता आर्कटिक से लेकर हिंद महासागर तक प्रभाव डाल सकता है। इससे भारत को आर्कटिक और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का मौका मिलेगा, जबकि रूस को हिंद महासागर तक सीधी पहुंच मिल सकेगी।

भारत के लिए यह समझौता कई मायनों में अहम है। देश के करीब 60-70% सैन्य उपकरण रूसी मूल के हैं, जिनमें पनडुब्बियां, सुखोई-30MKI लड़ाकू विमान और S-400 मिसाइल सिस्टम शामिल हैं। ऐसे में यह समझौता इन उपकरणों के रखरखाव और संचालन को आसान बनाएगा।

रूस के लिए क्यों जरूरी

रूस लंबे समय से गर्म पानी वाले बंदरगाहों की तलाश में रहा है। इस समझौते के जरिए वह भारत या अंडमान-निकोबार जैसे रणनीतिक स्थानों पर अपने संसाधन तैनात कर सकता है, जिससे उसकी समुद्री पहुंच मजबूत होगी।

RELOS समझौते से दोनों देशों की सेनाओं के बीच तालमेल और बढ़ेगा। साइबर युद्ध, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और हाइपरसोनिक मिसाइल जैसी उन्नत तकनीकों में सहयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।

भू-राजनीतिक संदेश

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता वैश्विक मंच पर एक बड़ा संकेत है। बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को मजबूती मिलती है, वहीं रूस को नए रणनीतिक विकल्प हासिल होते हैं।

कुल मिलाकर, RELOS समझौता भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग को नई ऊंचाई देने के साथ-साथ वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी असर डाल सकता है।