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तेल-गैस संकट के बीच भारत की विकास दर पर खतरा, Moody’s की नई रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

मूडीज ने 2026 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान घटाकर 6% कर दिया है। तेल-गैस की बढ़ती कीमतें, कमजोर निजी खपत, धीमा निवेश और वैश्विक अनिश्चितता को इसकी बड़ी वजह बताया गया है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसका असर नौकरी, महंगाई और आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है।

 
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Moody’s Ratings: दुनिया की प्रमुख रेटिंग एजेंसी मूडीज (Moody’s Ratings) ने भारत की आर्थिक विकास दर को लेकर बड़ा अनुमान जारी किया है। एजेंसी ने मंगलवार, 12 मई को कहा कि वर्ष 2026 में भारत की GDP ग्रोथ उम्मीद से कमजोर रह सकती है। मूडीज ने भारत की विकास दर का अनुमान 0.8 प्रतिशत अंक घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है। वहीं, 2027 के लिए भी ग्रोथ अनुमान 0.5 प्रतिशत अंक घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया गया है।

मूडीज ने अपनी ‘ग्लोबल मैक्रो आउटलुक मई अपडेट’ रिपोर्ट में कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव, तेल-गैस की महंगी कीमतों और उर्वरकों की कमी से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ रही है। इसका असर भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों पर ज्यादा पड़ सकता है।

कमजोर खपत बनी सबसे बड़ी चिंता

रिपोर्ट के अनुसार भारत की आर्थिक रफ्तार धीमी होने की सबसे बड़ी वजह कमजोर निजी खपत (Private Consumption) है। तेल, गैस और बिजली जैसी ऊर्जा लागत बढ़ने से आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।

जब परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के खर्चों में ही खर्च होने लगता है, तो लोग गैर-जरूरी खरीदारी, बड़े निवेश और खर्चों को टालने लगते हैं। इससे बाजार में मांग कमजोर होती है और आर्थिक गतिविधियों की गति धीमी पड़ने लगती है।

निवेश और नए प्रोजेक्ट्स पर असर

मूडीज ने पूंजी निर्माण (Capital Formation) में सुस्ती को भी बड़ा कारण बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक जब कंपनियों को भविष्य में मांग कमजोर दिखाई देती है या लागत बढ़ती नजर आती है, तो वे नए प्रोजेक्ट्स, फैक्ट्रियां और मशीनरी में निवेश टाल सकती हैं।

इसका सीधा असर निजी निवेश की रफ्तार पर पड़ता है और अर्थव्यवस्था की ग्रोथ धीमी होने लगती है।

महंगे तेल से उद्योगों पर दबाव

तेल और गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की लागत भी बढ़ रही है। कंपनियों को बिजली, ईंधन और लॉजिस्टिक्स पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।

जब उत्पादन लागत बढ़ती है तो कंपनियों के सामने दो ही विकल्प बचते हैं — या तो कीमतें बढ़ाई जाएं या मुनाफा कम किया जाए। दोनों ही स्थितियों में उत्पादन और मांग प्रभावित होती है, जिसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

ऊर्जा आयात पर निर्भरता बढ़ा रही जोखिम

भारत अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल और गैस के आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल-गैस की कीमतों में उछाल का सीधा असर देश के आयात बिल, महंगाई और रुपये की स्थिति पर पड़ता है।

मूडीज ने कहा कि भारत उच्च तेल कीमतों के प्रति “विशेष रूप से संवेदनशील” बना हुआ है। हालांकि देश में सोलर, विंड और जल ऊर्जा पर जोर बढ़ाया जा रहा है, लेकिन फिलहाल बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा कोयले पर आधारित है।

आम आदमी की जेब पर कैसे पड़ेगा असर?

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि विकास दर धीमी होने का असर सबसे ज्यादा आम लोगों पर दिखाई देगा। दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज में कॉमर्स विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर अक्षय मिश्रा के मुताबिक जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटती है, तो कंपनियां नई भर्तियां कम कर सकती हैं और बड़े निवेश फैसलों को टाल सकती हैं।

इसका असर खासकर युवाओं, फ्रेशर्स और प्राइवेट सेक्टर में नौकरी तलाश रहे लोगों पर ज्यादा पड़ सकता है। कई सेक्टरों में वेतन वृद्धि धीमी हो सकती है और कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरियों का दबाव बढ़ सकता है।

शेयर बाजार और कारोबार पर भी दबाव

फाइनेंस एक्सपर्ट शरद कोहली का कहना है कि आर्थिक ग्रोथ धीमी पड़ने पर सरकार पर इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और राहत पैकेज बढ़ाने का दबाव बढ़ सकता है। वहीं निवेश सलाहकार विनोद रावल के अनुसार, कंपनियों की कमाई प्रभावित होने से शेयर बाजार में भी कमजोरी देखने को मिल सकती है।

बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के कारण नए निवेश की गति धीमी पड़ सकती है और छोटे कारोबारियों को भी कम मांग का सामना करना पड़ सकता है।

अभी भी बची हैं उम्मीदें

हालांकि मूडीज ने यह भी कहा कि तेल और गैस टैंकरों की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। भारत रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ा रहा है, जिससे कुछ राहत मिल सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक हालात स्थिर होते हैं और ऊर्जा कीमतों में नरमी आती है, तो भारत की अर्थव्यवस्था फिर से तेजी पकड़ सकती है।