International Labour Day 2026: मजदूर दिवस क्यों मनाया जाता है? जानें इतिहास और आज के दौर में इसका महत्व
आसमान छूती इमारतें, मीलों लंबी सड़कें और हमारी थाली तक पहुंचता अन्न—इन सबके पीछे करोड़ों मेहनतकश हाथों की ताकत छिपी है। आदिमानव के दौर से लेकर आज की आधुनिक डिजिटल दुनिया तक, इंसान की हर उपलब्धि की नींव ‘श्रम’ पर ही टिकी है। कुम्हार से लेकर किसान और फैक्ट्री मजदूर तक, हर श्रमिक इस विकास यात्रा का सच्चा निर्माता है।
8 घंटे काम का हक ऐसे मिला
आज 8 घंटे की नौकरी सामान्य लगती है, लेकिन इसके पीछे लंबा संघर्ष छिपा है। 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के दौरान मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता था। इस शोषण के खिलाफ 1 मई 1886 को अमेरिका में बड़ा आंदोलन हुआ, जहां मजदूरों ने “8 घंटे काम, 8 घंटे आराम और 8 घंटे मनोरंजन” की मांग उठाई।
शिकागो के हैमार्केट में हुए प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और कई मजदूरों की जान गई। उनकी शहादत को सम्मान देने के लिए 1889 में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस घोषित किया गया।
भारत में मजदूर आंदोलन की शुरुआत
भारत में भी अंग्रेजों के दौर में मजदूरों का जमकर शोषण हुआ। इसके खिलाफ 1920 में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना हुई। देश में पहली बार 1 मई 1923 को मद्रास (अब चेन्नई) में मजदूर दिवस मनाया गया।
आजादी के बाद सरकार ने मजदूरों के हित में कई कानून बनाए, जैसे न्यूनतम मजदूरी कानून (1948), औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947) और भविष्य निधि (PF) कानून (1952)। हाल के वर्षों में लेबर कोड्स के जरिए इन कानूनों को सरल बनाने की कोशिश की जा रही है।
नई सदी की नई चुनौतियां
समय के साथ काम करने का स्वरूप बदल गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के चलते पारंपरिक रोजगार प्रभावित हो रहे हैं। वहीं गिग इकॉनमी के बढ़ते चलन में लोग डिलीवरी एजेंट, कैब ड्राइवर और फ्रीलांसर के रूप में काम कर रहे हैं, जहां लचीलापन तो है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा की कमी बनी हुई है।
कोरोना महामारी के दौरान प्रवासी मजदूरों का पलायन इस बात का बड़ा उदाहरण रहा कि मजबूत सामाजिक सुरक्षा के बिना श्रमिक वर्ग कितनी मुश्किलों का सामना करता है।
मजदूर ही विकास की असली ताकत
मजदूर सिर्फ उत्पादन का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की तरक्की की असली धुरी हैं। जब तक हर श्रमिक को सम्मान, सुरक्षा और स्थिर जीवन नहीं मिलेगा, तब तक विकास अधूरा ही रहेगा।
