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आबकारी नीति केस की सुनवाई से खुद को केजरीवाल ने किया अलग, हाई कोर्ट जज को लिखा पत्र, लगाए कई गंभीर आरोप

 
Arvind
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अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली आबकारी नीति मामले में बड़ा कदम उठाते हुए जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को एक विस्तृत पत्र लिखकर आगे की न्यायिक कार्यवाही में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

केजरीवाल ने कहा कि यह फैसला उन्होंने अपने “अंतःकरण” और “न्यायिक निष्पक्षता पर उठे सवालों” के आधार पर लिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी गुस्से या अदालत के प्रति असम्मान की भावना से नहीं उठाया गया है।

न्यायपालिका पर भरोसा कायम: केजरीवाल

अपने पत्र में केजरीवाल ने लिखा कि पिछले 75 वर्षों में जब अन्य संस्थाएं कमजोर पड़ीं, तब देश की जनता ने न्यायपालिका पर भरोसा किया। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य न्यायपालिका को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता को मजबूत करना है।

उन्होंने कहा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।

जज के परिवार और संगठन से जुड़ाव पर सवाल

केजरीवाल ने पत्र में दो प्रमुख चिंताओं का उल्लेख किया—

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का कथित तौर पर आरएसएस से जुड़े संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से सार्वजनिक जुड़ाव। उनके बच्चों का केंद्र सरकार के पैनल में वकील होना, जबकि मामले में केंद्र सरकार और सीबीआई विपक्षी पक्ष हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा उनके बच्चों को मामलों का आवंटन किया जाना हितों के टकराव की आशंका पैदा करता है।

‘आम नागरिक कैसे भरोसा करे?’

केजरीवाल ने पत्र में कहा कि ऐसे हालात में एक आम नागरिक कैसे विश्वास कर सकता है कि सुनवाई पूरी तरह निष्पक्ष होगी, खासकर तब जब मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो।

उन्होंने कहा कि यह मामला अब केवल उनका निजी मामला नहीं रह गया है, बल्कि राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुका है।

गांधीवादी सत्याग्रह का हवाला

अपने फैसले को गांधीवादी सत्याग्रह की भावना से प्रेरित बताते हुए केजरीवाल ने कहा कि वह अब इस मामले की आगे की कार्यवाही में न स्वयं शामिल होंगे और न ही अपने वकील के माध्यम से।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अन्य मामलों में वह अदालत की प्रक्रिया में हिस्सा लेते रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित

केजरीवाल ने कहा कि उन्हें इस आदेश को चुनौती देने और सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार सुरक्षित है। साथ ही उन्होंने दोहराया कि उनका संविधान और न्यायपालिका में विश्वास कायम है।

उन्होंने अनुरोध किया कि उनके इस पत्र को न्यायालय के रिकॉर्ड में शामिल किया जाए।