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LPG vs DME: स्वदेशी DME से मिलेगी LPG को चुनौती, बिना नया चूल्हा खरीदे घटेगा किचन का खर्च
 

 
 LPG vs DME: स्वदेशी DME से मिलेगी LPG को चुनौती, बिना नया चूल्हा खरीदे घटेगा किचन का खर्च
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भारत में रसोई गैस के तौर पर इस्तेमाल होने वाले LPG का जल्द ही एक स्वदेशी और सस्ता विकल्प मिल सकता है। वैज्ञानिक डाइमेथाइल ईथर (DME) नाम के एक नए ईंधन पर काम कर रहे हैं, जो न सिर्फ लागत में कम होगा बल्कि पर्यावरण के लिए भी ज्यादा सुरक्षित साबित हो सकता है।

हाल ही में CSIR-नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशन एंड पॉलिसी रिसर्च ने जानकारी दी कि भारतीय वैज्ञानिक DME को LPG के विकल्प के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं। वैश्विक परिस्थितियों के कारण LPG की कीमतों और सप्लाई में होने वाले उतार-चढ़ाव के बीच यह खोज काफी अहम मानी जा रही है।

क्या है DME?

डाइमेथाइल ईथर (DME) एक सिंथेटिक ईंधन है, जो जलने पर बेहद साफ होता है। इसके गुण LPG से काफी मिलते-जुलते हैं। सामान्य तापमान पर यह गैस के रूप में होता है, लेकिन हल्के दबाव में इसे तरल बनाकर स्टोर और ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे LPG।

कैसे बनता है यह स्वदेशी ईंधन?

वैज्ञानिकों के अनुसार DME को दो तरीकों से तैयार किया जा सकता है। पहला तरीका है सिनगैस (कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण) से पहले मेथेनॉल बनाना और फिर उसे DME में बदलना। दूसरा तरीका सीधे एक रिएक्टर में इसे तैयार करना है।
CSIR-National Chemical Laboratory के वैज्ञानिकों ने एक सस्ता और प्रभावी कैटालिस्ट विकसित किया है, जिससे मेथेनॉल को DME में आसानी से बदला जा सकता है।

क्या LPG की जगह ले सकता है DME?

विशेषज्ञों का मानना है कि DME को मौजूदा LPG सिस्टम में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। अभी के LPG सिलेंडर, रेगुलेटर और स्टोव में 8% तक DME का मिश्रण बिना किसी बदलाव के उपयोग किया जा सकता है।

DME के बड़े फायदे:

  • कम प्रदूषण: यह कालिख, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड का उत्सर्जन काफी कम करता है।
  • इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव नहीं: मौजूदा गैस चूल्हा और सिलेंडर ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
  • आत्मनिर्भरता की ओर कदम: इसे बायोमास, कोयला और रिसाइकिल कार्बन डाइऑक्साइड से देश में ही तैयार किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि DME भारत के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। इससे न केवल आम लोगों को सस्ती गैस मिलेगी, बल्कि देश की ऊर्जा जरूरतों में आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी और पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ी मदद मिलेगी।