MSP का दायरा बढ़ा, लाभार्थी बढ़े… लेकिन भरोसा क्यों नहीं बढ़ा? पढ़िए पूरी पड़ताल
सरकार ने 2024-25 में MSP पर रिकॉर्ड 3.47 लाख करोड़ खर्च कर 19.6 मिलियन किसानों से खरीद की, फिर भी किसान असंतुष्ट हैं। कारण है MSP की कानूनी गारंटी का अभाव और कीमत निर्धारण का विवाद। आंकड़े बेहतर हैं, लेकिन किसानों को आय की स्थायी सुरक्षा अब भी नहीं मिली।
MSP Procurement 2025: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सरकार का खर्च और खरीद लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। 2024-25 में MSP के तहत 3.47 लाख करोड़ रुपये खर्च किए गए, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। सरकारी खरीद का दायरा बढ़ा है और लाभ पाने वाले किसानों की संख्या भी बढ़ी है। लेकिन इसके बावजूद MSP को लेकर किसान आंदोलन और असंतोष खत्म नहीं हुआ। यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है—जब आंकड़े इतने मजबूत हैं, तो किसान असंतुष्ट क्यों हैं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में MSP के तहत 122.3 मिलियन मीट्रिक टन फसलों की खरीद हुई, जो पिछले वर्ष के 108.9 मिलियन मीट्रिक टन से काफी अधिक है। इसी तरह MSP का लाभ पाने वाले किसानों की संख्या 15.2 मिलियन से बढ़कर 19.6 मिलियन हो गई। यह संकेत देता है कि सरकार ने खरीद प्रणाली का विस्तार किया है और पहले की तुलना में अधिक किसानों को इसमें शामिल किया है।
लंबे समय तक यह तर्क दिया जाता रहा कि MSP का लाभ बहुत कम किसानों तक सीमित है। शांता कुमार समिति की 2015 की रिपोर्ट में कहा गया था कि केवल 6 प्रतिशत किसानों को ही MSP का सीधा लाभ मिलता है। हालांकि, हालिया आंकड़े बताते हैं कि अब यह दायरा बढ़कर लगभग 14 प्रतिशत कृषि परिवारों तक पहुंच गया है। गेहूं और धान के अलावा अब दलहन और तिलहन की खरीद में भी वृद्धि हुई है।
इसके बावजूद किसानों की नाराजगी का सबसे बड़ा कारण MSP की कानूनी गारंटी का अभाव है। वर्तमान में MSP केवल सरकारी खरीद तक सीमित है और निजी व्यापारी इस कीमत को देने के लिए बाध्य नहीं हैं। कई बार बाजार में किसानों को MSP से कम कीमत पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है, खासकर तब जब सरकारी खरीद केंद्र सीमित या दूर होते हैं। किसान संगठनों का कहना है कि जब तक MSP को कानूनी अधिकार नहीं बनाया जाएगा, तब तक घोषित कीमत का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा।
MSP की गणना को लेकर भी विवाद बना हुआ है। सरकार MSP तय करने के लिए A2+FL फार्मूले का उपयोग करती है, जिसमें नकद खर्च और परिवार के श्रम का मूल्य शामिल होता है। लेकिन किसान संगठन स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए C2 फार्मूले की मांग कर रहे हैं, जिसमें जमीन का किराया और पूंजी लागत भी शामिल होती है। उदाहरण के तौर पर 2025-26 के खरीफ सीजन में धान का MSP 2,369 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है, जबकि C2 फार्मूले के अनुसार यह करीब 3,135 रुपये होना चाहिए।
सरकार की ओर से MSP पर खरीद का संचालन मुख्य रूप से भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य एजेंसियों के माध्यम से किया जाता है। दलहन और तिलहन की खरीद PM-AASHA योजना के तहत NAFED और NCCF जैसी संस्थाएं करती हैं। MSP का उद्देश्य किसानों को गिरती कीमतों से सुरक्षा देना है, लेकिन किसान अब केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि स्थायी और कानूनी आश्वासन चाहते हैं।
संपादकीय दृष्टि से देखें तो MSP प्रणाली का विस्तार निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि केवल खरीद बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। जब तक MSP को पूरे बाजार में लागू करने और किसानों की आय को स्थायी सुरक्षा देने का भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक असंतोष जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।
MSP की बहस अब केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि भरोसे और सुरक्षा की बहस बन चुकी है। यही इस पूरे मुद्दे की असली चुनौती है।
