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मेरी बेटी ने भी 8वीं तक..., CBSE तीन-भाषा नीति पर विरोध के बीच धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा बयान
 

 
मेरी बेटी ने भी 8वीं तक..., CBSE तीन-भाषा नीति पर विरोध के बीच धर्मेंद्र प्रधान का बड़ा बयान
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नई दिल्ली। कक्षा 9 के छात्रों के लिए सीबीएसई की नई तीन-भाषा नीति को लेकर देशभर में चल रही बहस के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सरकार का पक्ष स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जो भी निर्णय देगा, केंद्र सरकार उसका पूरी तरह सम्मान और पालन करेगी।

धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट जो कहेगा, हम वही करेंगे।” उन्होंने यह बयान उन सवालों के जवाब में दिया जो नई भाषा नीति को लेकर अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों द्वारा उठाए जा रहे हैं।

शिक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया कि सीबीएसई ने कोई नई व्यवस्था लागू नहीं की है। उन्होंने बताया कि देश के लगभग 99 प्रतिशत सीबीएसई स्कूलों में छात्र कक्षा 6 से 8 तक अपनी मातृभाषा या स्थानीय भाषा का अध्ययन करते हैं और नया सर्कुलर केवल इसी व्यवस्था को कक्षा 9 तक जारी रखने की बात करता है।

बेटी का उदाहरण देकर समझाई नीति

धर्मेंद्र प्रधान ने अपनी बेटी का उदाहरण देते हुए कहा, “मेरी बेटी ने भी 8वीं तक मराठी भाषा पढ़ी है।” उन्होंने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करना भारत की पुरानी परंपरा रही है और नई शिक्षा नीति 2020 में भी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि बच्चों को अपनी भाषा, संस्कृति और जड़ों से जोड़ना आवश्यक है। सरकार का उद्देश्य भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाना और छात्रों को बहुभाषी शिक्षा प्रणाली से जोड़ना है।

2026-27 सत्र से लागू होगी नई व्यवस्था

सीबीएसई ने हाल ही में घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा 9 के छात्रों को तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं शामिल होंगी। इस घोषणा के बाद कई राज्यों और अभिभावक संगठनों ने चिंता जताई है।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

नई भाषा नीति के खिलाफ कई अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कई स्कूलों में पर्याप्त भाषा शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं और इससे छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, सीबीएसई और एनसीईआरटी से जवाब तलब किया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना एक सकारात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने से पहले व्यावहारिक और प्रशासनिक चुनौतियों पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।

फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और आगामी सुनवाई के बाद इस नीति को लेकर स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।