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क्या होता है पीस बॉन्ड, जिसे भरने के लिए नेहा बोरा को मिला था नोटिस? जानें नियम

दिल्ली हाईकोर्ट ने AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की 10,000 रुपये के पीस बॉन्ड नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मजिस्ट्रेट को संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने और कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के निर्देश दिए। जानिए क्या होता है पीस बॉन्ड और इसके नियम क्या हैं।

 
पीस बॉन्ड
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नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी थी। नोटिस में उनसे जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानती देने को कहा गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया है कि कार्यवाही में इस्तेमाल की जाने वाली सभी संबंधित सामग्री नेहा बोरा को उपलब्ध कराई जाए। 

नेहा बोरा की याचिका क्यों खारिज हुई?

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने शुक्रवार को याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि इस स्तर पर रिट याचिका खारिज की जा रही है। अदालत ने साथ ही निर्देश दिया कि नेहा बोरा को नोटिस जारी करने के आधार में इस्तेमाल की गई सभी सामग्री उपलब्ध कराई जाए।

मामला 17 अक्टूबर 2026 को जारी उस नोटिस से जुड़ा है, जिसमें नेहा बोरा को स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर यह बताने के लिए कहा गया था कि जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए उनसे 10,000 रुपये का निजी बॉन्ड और एक जमानती क्यों न मांगा जाए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135 के प्रावधानों पर विचार करना होगा। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि बॉन्ड शुरुआत में ही मांगा जाना चाहिए या जांच के दौरान सामने आने वाली परिस्थितियों के आधार पर इस पर फैसला किया जाना चाहिए। 

प्रदर्शन के दौरान हिरासत में ली गई थीं नेहा बोरा

नेहा बोरा को 16 अक्टूबर को दिल्ली में 'लहरा दो तिरंगा' मार्च में शामिल होने जाते समय हिरासत में लिया गया था। यह मार्च कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आयोजित किया गया था। उन्हें अगले दिन, 17 अक्टूबर को रिहा कर दिया गया था।

इसके बाद स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से नोटिस जारी किया गया। इसमें कथित नारेबाजी, जंतर-मंतर के आसपास प्रतिबंधात्मक आदेशों के बावजूद प्रदर्शन और लोगों को प्रदर्शन में शामिल होने के लिए उकसाने जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया था। ये आरोप कार्यवाही का हिस्सा हैं; इन्हें अदालत द्वारा दोष सिद्ध किए जाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 

क्या होता है पीस बॉन्ड?

पीस बॉन्ड यानी शांति बनाए रखने का बॉन्ड एक कानूनी प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य संभावित रूप से शांति भंग होने की आशंका को रोकना है। यह किसी अपराध की सजा के तौर पर नहीं, बल्कि एहतियाती कदम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 126 के तहत, यदि मजिस्ट्रेट को विश्वसनीय जानकारी मिलती है कि किसी व्यक्ति से शांति भंग होने या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका है, तो वह उस व्यक्ति से कारण बताने को कह सकता है कि उससे निश्चित अवधि तक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड क्यों न भरवाया जाए।

इस प्रक्रिया में संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिया जाता है और उसे अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है। कानून के तहत शांति बनाए रखने के बॉन्ड की अवधि अधिकतम एक वर्ष हो सकती है।

पीस बॉन्ड भरने का क्या मतलब है?

पीस बॉन्ड भरने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति अपने सभी कानूनी अधिकार खो देता है। हालांकि, बॉन्ड की शर्तों का पालन करना जरूरी होता है। किसी प्रदर्शन पर रोक लागू है या नहीं, यह संबंधित स्थान पर जारी आदेशों और लागू कानून पर निर्भर करता है।

बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ है या नहीं, इसका निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, परिस्थितियों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाता है।

बॉन्ड देने से इनकार करने पर क्या हो सकता है?

पीस बॉन्ड की कार्यवाही में बॉन्ड या जमानतदार देने से इनकार करने के कानूनी परिणाम हो सकते हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने या आगे की कार्रवाई करने का फैसला लागू कानून और मजिस्ट्रेट के आदेश के अनुसार होता है।

नेहा बोरा के मामले में हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट को सभी संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने और बॉन्ड की आवश्यकता तथा उसके समय को लेकर कानूनी प्रावधानों पर विचार करने का निर्देश दिया है। इसलिए याचिका खारिज होने को इस रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि हाईकोर्ट ने हर पहलू पर अंतिम आदेश देते हुए बॉन्ड की शर्तों को बिना किसी आगे की प्रक्रिया के लागू कर दिया है।

कौन होते हैं स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट?

स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट यानी SEM प्रशासनिक व्यवस्था के तहत कार्य करते हैं। दिल्ली में पुलिस के सहायक आयुक्त (ACP) रैंक के अधिकारियों को भी विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियां दी गई हैं।

शांति बनाए रखने से जुड़ी एहतियाती कार्यवाही में SEM नोटिस जारी करने और संबंधित व्यक्ति का पक्ष सुनने की प्रक्रिया संभालते हैं। ऐसी कार्यवाही में नोटिस के आधार, उपलब्ध सामग्री और व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर देना महत्वपूर्ण होता है।

नेहा बोरा के मामले में हाईकोर्ट ने इसी प्रक्रिया के तहत संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। 

पीस बॉन्ड की प्रक्रिया पर पहले भी उठे हैं सवाल

पीस बॉन्ड और एहतियाती हिरासत से जुड़े प्रावधानों के इस्तेमाल पर पहले भी सवाल उठाए गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में ऐसे प्रावधानों के इस्तेमाल और इनके तहत हिरासत में लिए गए लोगों की स्थिति पर चिंता जताई थी। विशेष रूप से उन लोगों की मुश्किलों का उल्लेख किया गया था, जिन्हें बॉन्ड की राशि या जमानती का इंतजाम करने में परेशानी होती है।

नेहा बोरा के मामले में हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए भी संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने और मजिस्ट्रेट को कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के निर्देश दिए हैं।