GDP 7.8% बढ़ रही है तो PM मोदी ने विदेश यात्रा और सोना खरीदने से क्यों किया सावधान? श्रीधर वेम्बू ने समझाया पूरा मामला
नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था ने अप्रैल-जून तिमाही में 7.8 फीसदी की मजबूत GDP ग्रोथ दर्ज की है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा, विदेश में शादी और गैर-जरूरी सोने की खरीद से बचने की अपील को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यही है कि जब अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो फिर विदेशी मुद्रा बचाने की जरूरत क्यों है? इसी सवाल का जवाब जोहो के सह-संस्थापक और चीफ साइंटिस्ट श्रीधर वेम्बू ने दिया है।
क्या है पूरा मामला?
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की 7.8 फीसदी GDP ग्रोथ का जिक्र करते हुए आत्मनिर्भरता और स्वदेशी पर जोर दिया। उन्होंने लोगों से गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं, विदेश में शादियों और जरूरत न होने पर सोना खरीदने से बचने की अपील की। इसके बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठा कि मजबूत आर्थिक विकास के बावजूद सरकार विदेशी खर्च कम करने की बात क्यों कर रही है।
इसी सवाल पर श्रीधर वेम्बू ने अपनी राय रखते हुए समझाया कि GDP ग्रोथ और विदेशी मुद्रा बचाने की जरूरत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
तेज आर्थिक विकास के साथ बढ़ती है आयात की जरूरत
वेम्बू के मुताबिक भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन देश अभी भी ऊर्जा और आधुनिक तकनीक के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से बढ़ती है, उतनी ही ज्यादा ऊर्जा और तकनीकी इनपुट की जरूरत पड़ती है।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत के बढ़ते निर्यात में इस्तेमाल होने वाली कई चीजें भी विदेशों से आती हैं। इनमें प्रिसिजन मशीनें, सामग्री, CPU, GPU और एडवांस सॉफ्टवेयर शामिल हैं। यानी निर्यात बढ़ने के बावजूद विदेशी मुद्रा की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होती।
सोना और विदेश यात्रा का विदेशी मुद्रा से क्या संबंध?
सोना खरीदने के लिए भारत को बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ता है। इसी तरह विदेश यात्रा या विदेश में शादी पर खर्च किया गया पैसा देश के बाहर जाता है। ऐसे खर्च विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को बढ़ा सकते हैं।
वेम्बू ने भारत की स्थिति की तुलना तेजी से बढ़ती कंपनी से की। उनका कहना है कि जिस तरह कोई तेजी से बढ़ने वाली कंपनी अपने विस्तार के लिए पूंजी बचाकर रखती है, उसी तरह भारत को भी अपनी विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए।
क्या भारत हमेशा विदेशी मुद्रा बचाता रहेगा?
वेम्बू का तर्क है कि यह स्थिति स्थायी नहीं है। जब भारत एडवांस टेक्नोलॉजी में अपनी क्षमता विकसित कर लेगा और घरेलू स्तर पर ऊर्जा जरूरतों के लिए मजबूत तकनीक तैयार कर लेगा, तब विदेशी मुद्रा बचाने का दबाव कम हो सकता है।
उन्होंने इसके लिए जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया और बाद में चीन का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक इन देशों ने भी तेज आर्थिक विकास के दौर में विदेशी मुद्रा को लेकर सावधानी बरती थी।
7.8 फीसदी GDP ग्रोथ का मतलब यह नहीं है कि देश को विदेशी मुद्रा के इस्तेमाल को लेकर कोई चिंता नहीं रहनी चाहिए। श्रीधर वेम्बू ने प्रधानमंत्री की अपील को इसी आर्थिक संदर्भ में समझाया है। भारत की तेज ग्रोथ के साथ आयातित ऊर्जा और तकनीक की जरूरत बनी हुई है, इसलिए विदेशी मुद्रा का विवेकपूर्ण इस्तेमाल आर्थिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
