Pune Airport Crisis: एक फाइटर जेट की हार्ड लैंडिंग से थम गई उड़ानें, ‘डुअल-यूज’ मॉडल पर उठे बड़े सवाल
पुणे एयरपोर्ट पर सुखोई फाइटर जेट की हार्ड लैंडिंग के बाद 30 से ज्यादा उड़ानें प्रभावित हुईं। इस घटना ने डुअल-यूज एयरपोर्ट मॉडल की चुनौतियों को उजागर किया है, जहां सैन्य और नागरिक उड़ानें एक ही रनवे साझा करती हैं।
Pune Airport Crisis: पुणे के लोहेगांव एयरपोर्ट पर 17 अप्रैल की रात एक अप्रत्याशित घटना ने पूरे एयर ट्रैफिक सिस्टम को ठप कर दिया। भारतीय वायुसेना का एक सुखोई लड़ाकू विमान लैंडिंग के दौरान तकनीकी खराबी का शिकार हो गया और रनवे के बीचों-बीच रुक गया। हालांकि एयरक्रू पूरी तरह सुरक्षित रहे, लेकिन इस घटना के कारण रनवे पूरी तरह ब्लॉक हो गया, जिससे न तो कोई फ्लाइट उतर सकी और न ही उड़ान भर पाई।
30 से ज्यादा फ्लाइट्स प्रभावित, यात्रियों को झेलनी पड़ी परेशानी
रनवे बाधित होने के कारण पुणे एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। करीब 30 से अधिक उड़ानों को रद्द करना पड़ा या उन्हें मुंबई और अहमदाबाद जैसे दूसरे शहरों की ओर डायवर्ट किया गया। हजारों यात्री रातभर एयरपोर्ट पर फंसे रहे। कई घंटों की मशक्कत के बाद भारी मशीनों की मदद से सुबह लगभग 8 बजे रनवे को खाली कराया गया, जिसके बाद उड़ानें धीरे-धीरे सामान्य हो सकीं।
क्या है ‘डुअल-यूज’ एयरपोर्ट मॉडल?
पुणे एयरपोर्ट का संचालन एक खास सिस्टम के तहत होता है, जिसे ‘डुअल-यूज मॉडल’ कहा जाता है। इस मॉडल में एयरपोर्ट का उपयोग एक साथ सैन्य और नागरिक दोनों उद्देश्यों के लिए किया जाता है। यहां रनवे, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और सुरक्षा का नियंत्रण भारतीय वायुसेना के पास होता है, जबकि नागरिक उड़ानों के लिए अलग टर्मिनल का उपयोग किया जाता है। यानी एक ही रनवे पर फाइटर जेट और पैसेंजर विमान दोनों निर्भर रहते हैं।
फायदे भी, लेकिन जोखिम भी बड़े
डुअल-यूज मॉडल से सरकार को नए एयरपोर्ट बनाने की लागत और समय दोनों की बचत होती है। खासकर पुणे जैसे बड़े शहरों में यह व्यवस्था तेजी से कनेक्टिविटी सुनिश्चित करती है।
लेकिन इसके साथ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं। यदि किसी सैन्य विमान में तकनीकी खराबी आ जाए, तो पूरा नागरिक उड्डयन सिस्टम प्रभावित हो जाता है। यात्रियों के लिए कोई वैकल्पिक रनवे उपलब्ध नहीं होता, जिससे देरी और रद्दीकरण बढ़ जाते हैं।
क्यों उठ रही है नए एयरपोर्ट की मांग?
इस घटना के बाद एक बार फिर पुणे में अलग सिविल एयरपोर्ट की जरूरत पर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ते शहर के लिए स्वतंत्र नागरिक एयरपोर्ट होना जरूरी है, ताकि सैन्य गतिविधियों का असर आम यात्रियों पर न पड़े। पुरंदर इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रोजेक्ट को लेकर भी मांग तेज हो गई है, जिसे लंबे समय से प्रस्तावित किया जा रहा है।
भविष्य के लिए क्या जरूरी है?
इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए बेहतर समन्वय और बैकअप सिस्टम की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार, वैकल्पिक रनवे, तेज रिकवरी मैकेनिज्म और स्पष्ट ऑपरेशन प्रोटोकॉल जैसे कदम भविष्य में ऐसी घटनाओं के प्रभाव को कम कर सकते हैं।
