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शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
 

 
 शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं, सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने प्रेम संबंधों और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि आपसी सहमति से बने रिश्ते में शादी से इनकार करना या ब्रेकअप होना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी ने जानबूझकर आत्महत्या के लिए उकसाया हो या ऐसा करने में मदद की हो।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने तेलंगाना से जुड़े एक मामले में यह टिप्पणी करते हुए महिला की आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में छह लोगों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत का यह आदेश 5 अक्टूबर 2026 का है, जिसकी जानकारी गुरुवार को सामने आई।

ब्रेकअप के बाद आत्महत्या को हमेशा उकसाना नहीं मान सकते

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है। अगर किसी प्रेम संबंध के टूटने के बाद कोई व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है, तो केवल इसी आधार पर दूसरे व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित करने के लिए आरोपी की मंशा और उसके आचरण को देखना जरूरी है। केवल शादी से इनकार करने या रिश्ता समाप्त होने से उत्पन्न भावनात्मक परिस्थितियों के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।

तीन महीने तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहे थे दोनों

यह मामला तेलंगाना के मेडचल-मलकाजगिरी जिले का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतका और उसका कथित प्रेमी बचपन से एक-दूसरे को जानते थे। दोनों के बीच आपसी सहमति से प्रेम संबंध बने और वे करीब तीन महीने तक एक ही घर में साथ रहे।

बताया गया कि शुरुआत में युवक ने महिला से शादी करने की बात कही थी और उसके परिवार ने भी रिश्ते को स्वीकार किया था। हालांकि, बाद में युवक के एक दोस्त द्वारा महिला के बारे में कथित रूप से आपत्तिजनक बातें कहने और परिवार के कुछ सदस्यों के विरोध के कारण शादी को लेकर विवाद शुरू हो गया।

शादी से इनकार के बाद महिला ने की थी आत्महत्या

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, आत्महत्या से पहले महिला ने अपनी बड़ी बहन को फोन कर बताया था कि उसका प्रेमी उससे शादी करने को तैयार नहीं है। उसने अगले दिन शादी नहीं होने पर आत्महत्या करने की बात भी कही थी।
इसके बाद युवक के घर पर विवाद हुआ। आरोपों के अनुसार, इसी घटनाक्रम के बाद महिला ने खुद को एक कमरे में बंद कर लिया और आत्महत्या कर ली।

मृतका की बहन की शिकायत पर पुलिस ने युवक, उसके माता-पिता, बहन और दो अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था।

सुप्रीम कोर्ट को नहीं मिले उकसाने के पर्याप्त आधार

मामले में आरोपियों ने निचली अदालत से आरोपमुक्त करने की मांग की थी, लेकिन दिसंबर 2024 में उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद तेलंगाना हाईकोर्ट से भी उन्हें राहत नहीं मिली।

आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शीर्ष अदालत ने रिकॉर्ड और आरोपों का परीक्षण करने के बाद पाया कि किसी भी आरोपी द्वारा महिला को आत्महत्या के लिए जानबूझकर उकसाने या इसके लिए प्रेरित करने का आवश्यक आधार सामने नहीं आया।

पीठ ने कहा कि शादी से इनकार करने के पीछे महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करने की मंशा साबित नहीं होती। साथ ही यह भी नहीं माना जा सकता कि आरोपियों को पहले से पता था कि उनके इस फैसले के कारण महिला आत्महत्या कर लेगी। 

छह आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष के आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने के बावजूद इस मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के आवश्यक तत्व सामने नहीं आते।

यह फैसला स्पष्ट करता है कि प्रेम संबंध टूटने या शादी से इनकार के बाद आत्महत्या होने पर किसी व्यक्ति को स्वतः अपराधी नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में जानबूझकर उकसाने, साजिश या आत्महत्या के लिए सहायता करने से संबंधित कानूनी आधारों की जांच जरूरी है।