NCERT के विवादित चैप्टर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: तीन विशेषज्ञों को सभी सरकारी प्रोजेक्ट्स से हटाने का आदेश
नई दिल्ली। Supreme Court of India ने National Council of Educational Research and Training (एनसीईआरटी) की किताबों में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े विवादित अध्याय को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस की बेंच ने इस मामले में गंभीर नाराजगी जताते हुए ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। अदालत ने इस अध्याय को तैयार करने से जुड़े तीन प्रमुख लोगों को तत्काल प्रभाव से सभी सरकारी परियोजनाओं और सार्वजनिक धन से जुड़े कार्यों से अलग करने का निर्देश दिया है।
विवादित चैप्टर लिखने वालों पर ‘बैन’
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया है कि जिन लोगों ने विवादित चैप्टर तैयार किया है, उन्हें भविष्य में किसी भी पाठ्यक्रम निर्माण प्रक्रिया से तुरंत अलग किया जाए। अदालत ने विशेष रूप से प्रोफेसर Michel Danino, Suparna Diwakar और Alok Prasanna Kumar का नाम लेते हुए कहा कि इन व्यक्तियों को ऐसी कोई जिम्मेदारी न दी जाए जिसमें सार्वजनिक धन का उपयोग शामिल हो।
नया पाठ्यक्रम और विशेषज्ञ समिति का गठन
अदालत ने आदेश दिया है कि यदि Chapter IV को दोबारा लिखा गया है तो उसे तब तक प्रकाशित नहीं किया जाएगा जब तक विशेषज्ञ समिति उसकी मंजूरी न दे दे। कोर्ट ने सरकार को एक सप्ताह के भीतर एक उच्च स्तरीय समिति बनाने का निर्देश दिया है, जिसमें एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक प्रमुख विद्वान और एक प्रसिद्ध वकील शामिल होंगे। साथ ही एनसीईआरटी को सलाह दी गई है कि समिति में किसी प्रतिष्ठित न्यायविद् को भी शामिल करने पर विचार किया जाए।
शिक्षा के स्तर को सुधारने के निर्देश
शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के उद्देश्य से अदालत ने निर्देश दिया है कि National Judicial Academy, भोपाल को उच्च कक्षाओं के कानूनी पाठ्यक्रम तय करने की प्रक्रिया में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। इसके अलावा, National Syllabus and Teaching Learning Material Committee (NSTC) के उन सदस्यों की भूमिका की भी समीक्षा करने को कहा गया है, जिन्होंने न्यायपालिका से जुड़े इस विवादित अध्याय को छपने से पहले देखा या मंजूरी दी थी।
मीडिया और आलोचना पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना को रोकने के लिए नहीं है। हालांकि अदालत ने उन मीडिया संस्थानों पर कड़ी टिप्पणी की है जिन्होंने इस मामले में कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे मीडिया संगठनों की पहचान की जाए और उनके खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, चाहे वे देश में हों या विदेश में।
