सुप्रीम कोर्ट ने अरावली में अवैध खनन पर कड़ी चेतावनी, ऐसे हालात बनेंगे जिन्हें सुधार पाना मुश्किल होगा, कमेटी गठित
नई दिल्ली I सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान चिंता जताई कि रोक के बावजूद अवैध गतिविधियां जारी हैं, जिससे ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं जिन्हें सुधारना असंभव हो जाएगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि अरावली का संरक्षण पर्यावरण संरक्षण का प्रमुख उद्देश्य है, न कि कोई प्रतिद्वंद्वी मुकदमा।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय बेंच ने अवैध खनन को गंभीर अपराध बताते हुए कहा कि इससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। कोर्ट ने राजस्थान सरकार से गारंटी ली कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का खनन नहीं होने दिया जाएगा। राजस्थान की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराजन ने आश्वासन दिया कि राज्य तुरंत प्रभाव से अवैध खनन रोकने के लिए कड़े कदम उठाएगा।
पीठ ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा, भूवैज्ञानिक, पर्यावरणीय और विधिक पहलुओं की समीक्षा के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने का संकेत दिया। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से चार सप्ताह के भीतर पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और खनन विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा है। यह कमेटी कोर्ट की निगरानी में काम करेगी और चरणबद्ध तरीके से गठित की जाएगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अरावली जैसी पर्वतमालाओं को सख्त परिभाषा में बांधना मुश्किल है, क्योंकि इनमें टेक्टोनिक मूवमेंट जारी रहते हैं। उन्होंने प्रारंभिक सुनवाई की मांग की, जिस पर कोर्ट ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर मिलेगा। कोर्ट ने नई रिट याचिकाएं दाखिल न करने की सलाह दी और कहा कि यह जानते हैं कि कुछ याचिकाएं क्यों दायर की जा रही हैं।
कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 के आदेश पर लगी रोक को जारी रखा। 29 दिसंबर 2025 के स्वतः संज्ञान आदेश के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि व्यापक नोट और अहम सवालों पर विचार के बाद सही फैसला लिया जाएगा। 'वन' और 'अरावली' की परिभाषाओं को अलग-अलग रखने पर भी जोर दिया गया।
कोर्ट ने केंद्र, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। पीठ ने जोर दिया कि अरावली का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
नई दिल्ली I सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन के मुद्दे पर सुनवाई के दौरान चिंता जताई कि रोक के बावजूद अवैध गतिविधियां जारी हैं, जिससे ऐसे हालात पैदा हो सकते हैं जिन्हें सुधारना असंभव हो जाएगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि अरावली का संरक्षण पर्यावरण संरक्षण का प्रमुख उद्देश्य है, न कि कोई प्रतिद्वंद्वी मुकदमा।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय बेंच ने अवैध खनन को गंभीर अपराध बताते हुए कहा कि इससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। कोर्ट ने राजस्थान सरकार से गारंटी ली कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार का खनन नहीं होने दिया जाएगा। राजस्थान की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराजन ने आश्वासन दिया कि राज्य तुरंत प्रभाव से अवैध खनन रोकने के लिए कड़े कदम उठाएगा।
पीठ ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा, भूवैज्ञानिक, पर्यावरणीय और विधिक पहलुओं की समीक्षा के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने का संकेत दिया। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से चार सप्ताह के भीतर पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और खनन विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा है। यह कमेटी कोर्ट की निगरानी में काम करेगी और चरणबद्ध तरीके से गठित की जाएगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि अरावली जैसी पर्वतमालाओं को सख्त परिभाषा में बांधना मुश्किल है, क्योंकि इनमें टेक्टोनिक मूवमेंट जारी रहते हैं। उन्होंने प्रारंभिक सुनवाई की मांग की, जिस पर कोर्ट ने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर मिलेगा। कोर्ट ने नई रिट याचिकाएं दाखिल न करने की सलाह दी और कहा कि यह जानते हैं कि कुछ याचिकाएं क्यों दायर की जा रही हैं।
कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 के आदेश पर लगी रोक को जारी रखा। 29 दिसंबर 2025 के स्वतः संज्ञान आदेश के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि व्यापक नोट और अहम सवालों पर विचार के बाद सही फैसला लिया जाएगा। 'वन' और 'अरावली' की परिभाषाओं को अलग-अलग रखने पर भी जोर दिया गया।
कोर्ट ने केंद्र, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली और हरियाणा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी। पीठ ने जोर दिया कि अरावली का संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
