सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: हिंदू महिलाएं अपनी संपत्ति की वसीयत ज़रूर करें, ताकि मृत्यु के बाद....
New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू महिलाओं को महत्वपूर्ण सलाह देते हुए कहा है कि उन्हें अपनी संपत्ति की स्पष्ट वसीयत अवश्य करनी चाहिए, ताकि उनकी मृत्यु के बाद मायके और ससुराल पक्ष के बीच विवाद खड़ा न हो। कोर्ट ने यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की, जिनमें निःसंतान विधवा की संपत्ति को उसके माता-पिता या भाई-बहनों को देने की मांग की गई थी। जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की दो- सदस्यीय बेंच ने इन याचिकाओं पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि इस विवाद को वसीयत के माध्यम से आसानी से रोका जा सकता है।
क्या था पूरा मामला?
यह विवाद हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा 15 और 16 की वैधता से जुड़ा था। कानून के अनुसार, अगर कोई महिला निःसंतान मरती है और उसने वसीयत नहीं बनाई है, तो उसकी संपत्ति पहले उसके पति को मिलेगी। यदि पति जीवित नहीं है, तो संपत्ति उसकी ससुराल के उत्तराधिकारियों को जाएगी। केवल पति के परिवार में कोई उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में संपत्ति मायके को मिल सकती है।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाओं में कहा गया कि आधुनिक समय में यह प्रावधान महिलाओं के साथ भेदभाव है, क्योंकि उनकी अर्जित संपत्ति भी सीधे उनके ससुराल वालों को दे दी जाती है। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि महिला की संपत्ति उसके जन्म के परिवार— माता-पिता या भाई-बहनों— को प्राथमिकता के आधार पर मिले।
कोर्ट की टिप्पणी और कारण
बेंच ने कानून में बदलाव से इनकार करते हुए कहा कि विवाह के बाद महिला का गोत्र और सामाजिक पहचान पति के परिवार से जुड़ जाती है। जजों ने यह भी कहा कि महिलाएं भरण-पोषण की मांग भी पति या उसके परिवार से ही करती हैं, न कि अपने मायके से। इसलिए कानून सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि वे ऐसे किसी फैसले का समर्थन नहीं करेंगे जो “हजारों वर्षों की सामाजिक व्यवस्था” को बाधित करे।
मध्यस्थता पर जोर
19 नवंबर के आदेश में शीर्ष अदालत ने ऐसे मामलों में मुकदमे से पहले मध्यस्थता की सलाह दी। कोर्ट ने कहा कि यदि निःसंतान विधवा बिना वसीयत मरती है, तो दोनों पक्ष पहले आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए समाधान खोजने की कोशिश करें। सफल मध्यस्थता को सिविल कोर्ट के आदेश के बराबर माना जाएगा।
