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दिल्ली दंगों के मामले में ताहिर हुसैन को 2 साल की जेल, 10 हजार रुपये जुर्माना भी लगा

दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दो साल की कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। अदालत ने कहा कि जनप्रतिनिधि होने के नाते उनसे शांति बनाए रखने की उम्मीद थी। जानिए कोर्ट ने सजा में राहत देने से क्यों इनकार किया।

 
दिल्ली दंगों
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Delhi Riots Case: उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों से जुड़े एक मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दो साल की सजा सुनाई है। अदालत ने उन पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना नहीं भरने पर उन्हें 10 दिन की अतिरिक्त साधारण कैद काटनी होगी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह की अदालत ने यह फैसला दयालपुर थाने में दर्ज FIR नंबर 120/2020 में सुनाया। इससे पहले 10 अक्टूबर 2026 को अदालत ने ताहिर हुसैन को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147 और धारा 109 के तहत दोषी ठहराया था।

कोर्ट ने कहा- जनप्रतिनिधि होने के नाते शांति बनाए रखना था कर्तव्य

सजा सुनाते हुए अदालत ने ताहिर हुसैन की भूमिका को गंभीर माना। कोर्ट ने कहा कि फरवरी 2020 में जब उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा हुई, उस समय ताहिर हुसैन जनता के चुने हुए प्रतिनिधि थे। उनसे उम्मीद थी कि वे लोगों को हिंसा से दूर रखने और इलाके में शांति बनाए रखने में मदद करेंगे।

अदालत के मुताबिक, इसके विपरीत ताहिर हुसैन पर दंगाइयों को अपने घर का इस्तेमाल करने देने का आरोप साबित हुआ। कोर्ट ने कहा कि उनका घर इलाके की ऊंची जगह पर स्थित था, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर दंगाइयों ने लोगों पर हमला करने और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने के लिए किया।

अदालत ने टिप्पणी की कि जिस पद का इस्तेमाल हिंसा रोकने के लिए होना चाहिए था, उसका इस्तेमाल हिंसा में मदद करने के लिए किया गया। इसी वजह से कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए सजा में राहत देने से इनकार कर दिया।

सरकारी पक्ष ने की थी अधिकतम सजा देने की मांग

सजा पर सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने अदालत से ताहिर हुसैन को कानून के तहत अधिकतम सजा देने की मांग की। अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी उन्हें दोषी ठहराया जा चुका है और यह उनकी दूसरी सजा है।

सरकारी पक्ष ने कहा कि एक जनप्रतिनिधि के रूप में ताहिर हुसैन की जिम्मेदारी हिंसा रोकने की थी, लेकिन अदालत में साबित हुए तथ्यों के मुताबिक, उन्होंने इसके उलट दंगाइयों की मदद की।

गौरतलब है कि इससे पहले अंकित शर्मा हत्याकांड में भी ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। यह मामला फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान खुफिया ब्यूरो (IB) के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या से जुड़ा है।

बचाव पक्ष ने कहा- ताहिर हुसैन भीड़ का हिस्सा नहीं थे

सुनवाई के दौरान ताहिर हुसैन के वकील ने कम सजा देने की मांग की। बचाव पक्ष ने दलील दी कि उनके मुवक्किल खुद दंगाइयों की भीड़ में शामिल नहीं थे और उनके खिलाफ हिंसा के दौरान खुद हमला करने का आरोप साबित नहीं हुआ।

वकील ने यह भी कहा कि ताहिर हुसैन का दावा था कि दंगाइयों ने उनके घर पर जबरन कब्जा कर लिया था। उन्होंने पुलिस कंट्रोल रूम (PCR) को फोन करने की बात भी कही थी।

हालांकि, अदालत ने कहा कि बचाव पक्ष इन दलीलों के समर्थन में पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सका। कोर्ट के सामने घर पर जबरन कब्जे की शिकायत का कोई रिकॉर्ड भी प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे इस दावे की पुष्टि हो सके।

कोर्ट ने क्यों नहीं दी सजा में राहत?

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का खुद हिंसक भीड़ में शामिल नहीं होना अपने आप में अपराध की गंभीरता को कम करने का आधार नहीं बन सकता। इस मामले में ताहिर हुसैन को दंगाइयों को अपने घर का इस्तेमाल करने देने के लिए दोषी ठहराया गया था।

कोर्ट ने माना कि बचाव पक्ष की ओर से ऐसी कोई ठोस वजह नहीं रखी गई, जिसके आधार पर सजा कम की जा सके। इसके बाद अदालत ने ताहिर हुसैन को दो साल की कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

जुर्माना जमा नहीं करने की स्थिति में उन्हें 10 दिन की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी। इस तरह उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े इस मामले में पूर्व पार्षद की कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई हैं।