लोकतंत्र के लिए खतरा- I-PAC मामले में सुप्रीम कोर्ट की ममता बनर्जी पर तीखी टिप्पणी
New Delhi : राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के ऑफिस और को-फाउंडर प्रतीक जैन के घर पर हुई ईडी छापेमारी से जुड़े मामले में अब बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा हो गया है। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की है।
“लोकतंत्र के लिए खतरा” जैसी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी राज्य की मुख्यमंत्री का जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना गंभीर विषय है और यह लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकता है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस तरह की घटनाओं को सिर्फ केंद्र और राज्य के विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता।
ED की याचिका पर सुनवाई
यह मामला प्रवर्तन निदेशालय (ED) की याचिका से जुड़ा है, जिस पर जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच सुनवाई कर रही है।
ED का आरोप है कि कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस में छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर पहुंचीं और जांच में हस्तक्षेप किया।
राज्य सरकार का पक्ष
बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि यह मामला अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र-राज्य विवाद का है, न कि अनुच्छेद 32 के तहत। उन्होंने कहा कि ED कोई व्यक्ति नहीं है, इसलिए वह मौलिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकती।
इस पर अदालत ने कहा कि यह मामला केंद्र-राज्य विवाद नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के कथित आचरण से जुड़ा है। कोर्ट ने कहा कि यदि मुख्यमंत्री जांच में हस्तक्षेप करती हैं, तो इसे गंभीरता से देखा जाएगा।
दस्तावेज साथ ले जाने का आरोप
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री कथित रूप से दस्तावेज भी साथ ले गई थीं, जो जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप का संकेत हो सकता है।
बंगाल सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि मामला बड़ी बेंच को भेजा जाए, लेकिन कोर्ट ने कहा कि हर याचिका में संवैधानिक सवाल उठते हैं, इसलिए हर मामले को बड़ी बेंच में नहीं भेजा जा सकता।
मामला क्या है?
यह विवाद 8 जनवरी को हुई ED की छापेमारी से जुड़ा है, जो कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग केस की जांच के तहत की गई थी। ED ने आरोप लगाया है कि इस दौरान राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ, जिसके बाद उसने आगे सीबीआई जांच और FIR रद्द करने की मांग की है।
यह मामला अब सिर्फ जांच एजेंसियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संवैधानिक और राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद मामले ने और गंभीर रूप ले लिया है।
