इंटरनेट का इस्तेमाल मौलिक अधिकार, बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिया ‘चाइल्ड मोड’ का सुझाव
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने इंटर87654 नेट के इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग करना बच्चों समेत प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत यह अधिकार सभी नागरिकों को प्राप्त है। बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के नाम पर उन्हें इंटरनेट के इस्तेमाल से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं, बल्कि दोनों अधिकारों का संरक्षण जरूरी है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री (CSEAM) की पहचान और उसे हटाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने के निर्देश देते हुए की। अदालत ने सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म को बच्चों की सुरक्षा के लिए मजबूत कदम उठाने की आवश्यकता बताई।
बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना उचित नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज के डिजिटल युग में इंटरनेट शिक्षा, सूचना, संवाद और अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए इंटरनेट कई बार शिक्षा और जानकारी प्राप्त करने का प्रमुख साधन होता है।
अदालत ने यह भी माना कि विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं। इनके माध्यम से ऐसे बच्चे समान परिस्थितियों का सामना कर रहे अन्य लोगों से जुड़ सकते हैं और अपने अनुभव साझा कर सकते हैं।
पीठ ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हानिकारक सामग्री को रोकने में संबंधित कंपनियों की विफलता के कारण बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच सीमित करना उचित समाधान नहीं है। बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबंध लगाने के बजाय ऑनलाइन वातावरण को सुरक्षित बनाना आवश्यक है।
सोशल मीडिया पर 'चाइल्ड मोड' लागू करने का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर विशेष 'चाइल्ड मोड' जैसी व्यवस्था विकसित करने का सुझाव दिया है। इसके तहत बच्चों के अकाउंट को डिफॉल्ट रूप से प्राइवेट रखने, अनजान वयस्कों के संपर्क और संदेशों पर रोक लगाने तथा बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री और विज्ञापनों की निगरानी जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।
अदालत ने कहा कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल में माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी को भी महत्व दिया जाना चाहिए। हालांकि, इन व्यवस्थाओं को लागू करने की विस्तृत प्रक्रिया तय करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर छोड़ी गई है।
हानिकारक सामग्री पर रोक लगाई जा सकती है
अदालत ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट तक पहुंच को मौलिक अधिकार मानने का अर्थ यह नहीं है कि बच्चों को हर प्रकार की ऑनलाइन सामग्री देखने की स्वतंत्रता होगी। केंद्र सरकार बच्चों के लिए स्वाभाविक रूप से हानिकारक सामग्री और सेवाओं, जैसे वयस्क सामग्री वाली वेबसाइटों, तक उनकी पहुंच सीमित करने के लिए उचित प्रतिबंध लगा सकती है।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने सहित कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।
पुराने फैसलों का भी दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वर्ष 2020 के अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले का उल्लेख किया। इस मामले में अदालत ने इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने के अधिकार को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होने की बात कही थी।
इसके अलावा पीठ ने वर्ष 2025 के प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ मामले का भी हवाला दिया, जिसमें डिजिटल पहुंच के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल दुनिया में बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना उतना ही आवश्यक है जितना उन्हें ऑनलाइन खतरों से सुरक्षित रखना। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच रोकने के बजाय हानिकारक सामग्री और उसके लिए जिम्मेदार लोगों पर प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए।
