लाल किले पर पहली बार गूंजी वंदे मातरम की धुन, जानिए कैसे बना आजादी की लड़ाई का सबसे बड़ा नारा
Vande Mataram के 150 साल पूरे होने पर लाल किले में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान इसकी धुन गूंजी। जानिए बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम कब लिखा, 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह कैसे बड़ा नारा बना और 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा कैसे मिला।
Vande Mataram 150 years: राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर स्वतंत्रता दिवस समारोह में इसकी गूंज ने देशभक्ति का माहौल और गहरा कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़ी सुरक्षा के बीच लाल किले की प्राचीर से 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह का नेतृत्व किया। कार्यक्रम के दौरान सेना के बैंड ने ‘वंदे मातरम’ की धुन बजाई और वहां मौजूद मेहमानों ने राष्ट्रीय गीत का सामूहिक गायन किया।
लाल किले पर ‘वंदे मातरम’ की खास झलक
लाल किले की प्राचीर को फूलों से सजाया गया था। सजावट के बीच राष्ट्रीय ध्वज लगाया गया था और उसके दोनों ओर हिंदी में ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ था। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इसके बाद राष्ट्रगान हुआ और राष्ट्रीय ध्वज को सलामी दी गई।
ध्वजारोहण के बाद भारतीय वायु सेना के दो Mi-17 हेलीकॉप्टरों ने समारोह स्थल पर फूलों की बारिश की। इनमें से एक हेलीकॉप्टर राष्ट्रीय ध्वज लेकर उड़ रहा था, जबकि दूसरे पर ‘वंदे मातरम’ लिखा हुआ ध्वज नजर आया।
1875 में हुई थी ‘वंदे मातरम’ की रचना
‘वंदे मातरम’ का इतिहास करीब डेढ़ सदी पुराना है। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसकी रचना 7 नवंबर 1875 को की थी। इसका शुरुआती प्रकाशन साहित्यिक पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में हुआ था।
बाद में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में शामिल किया, जो वर्ष 1882 में प्रकाशित हुआ। इसलिए ‘वंदे मातरम’ की रचना 1882 में हुई थी, यह कहना सही नहीं है। इसकी रचना और शुरुआती प्रकाशन 1875 में हो चुका था, जबकि 1882 में यह ‘आनंद मठ’ का हिस्सा बना।
‘वंदे मातरम’ का क्या मतलब है?
‘वंदे मातरम’ का सरल अर्थ है—‘मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।’ यहां ‘मां’ का संदर्भ मातृभूमि से है। यही भाव आगे चलकर इस गीत को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में बेहद प्रभावशाली बना गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं रहा, बल्कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष और देशभक्ति की भावना का मजबूत प्रतीक बन गया।
1905 में आंदोलन का बड़ा नारा बना ‘वंदे मातरम’
‘वंदे मातरम’ के इतिहास में वर्ष 1905 को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उस समय ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया था। इसके विरोध में बंगाल सहित देश के कई हिस्सों में आंदोलन तेज हुआ। विदेशी सामान के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का अभियान शुरू हुआ।
7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर निकाले गए बड़े जुलूस में हजारों छात्रों ने ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए। इसी दौरान विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी अपनाने का प्रस्ताव भी पारित किया गया।
यहीं से ‘वंदे मातरम’ की पहचान सिर्फ एक देशभक्ति गीत तक सीमित नहीं रही। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध और राष्ट्रीय चेतना का प्रभावशाली नारा बन गया।
कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में भी गूंजा
1905 में ही कांग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में ‘वंदे मातरम’ को अखिल भारतीय राष्ट्रीय आयोजनों के गीत के रूप में स्वीकार किया गया। इसके बाद यह स्वतंत्रता आंदोलन के विभिन्न कार्यक्रमों और सभाओं में लगातार गूंजता रहा। इसने अलग-अलग क्षेत्रों और वर्गों के लोगों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और धीरे-धीरे यह स्वतंत्रता संघर्ष की पहचान का हिस्सा बन गया।
1950 में मिला राष्ट्रीय गीत का दर्जा
देश की आजादी के बाद भी ‘वंदे मातरम’ का महत्व कायम रहा। वर्ष 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया।
इस तरह करीब 150 वर्षों की यात्रा में ‘वंदे मातरम’ साहित्यिक रचना से निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज और फिर स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में स्थापित हुआ।
150 साल पूरे होने पर सालभर चलेंगे कार्यक्रम
‘वंदे मातरम’ की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष नवंबर में सालभर चलने वाले समारोहों की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय गीत के ऐतिहासिक सफर, स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका और देश की राष्ट्रीय चेतना में इसके योगदान को याद करना है। लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम’ की धुन और सामूहिक गायन ने इसी ऐतिहासिक विरासत को एक बार फिर देश के सामने जीवंत कर दिया।
