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20 साल बाद अपडेट हुई वोटर लिस्ट, SIR में करोड़ों नाम कटे, गुजरात टॅाप पर तो यूपी दूसरे नंबर पर

 
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नई दिल्ली: देश में पहली बार इतने बड़े स्तर पर चलाए गए चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान में बड़ा खुलासा हुआ है। इस प्रक्रिया के तहत अब तक करीब 5.58 करोड़ यानी 9.55 फीसदी मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं। इस अभियान में सबसे ज्यादा असर गुजरात, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में देखने को मिला है।

रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने SIR के दूसरे चरण में 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया था। यह प्रक्रिया अक्टूबर 2025 से शुरू होकर हाल ही में पूरी हुई है। सिर्फ इसी चरण में 5.37 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो कुल का करीब 10.55 फीसदी है। अगर पहले चरण में शामिल बिहार को भी जोड़ दिया जाए, तो कुल मतदाताओं की संख्या 58.87 करोड़ से घटकर 53.28 करोड़ रह गई है।

दूसरे चरण में राजस्थान, गोवा, लक्षद्वीप, पुड्डुचेरी, गुजरात, छत्तीसगढ़, अंडमान-निकोबार, केरल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल रहे। इन सभी जगहों पर मतदाताओं की कुल संख्या 50.97 करोड़ से घटकर 45.59 करोड़ हो गई।

अगर राज्यों के हिसाब से देखें तो गुजरात में सबसे ज्यादा 13.39 फीसदी मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश में 13.23 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। छत्तीसगढ़ में 11.77 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 11.63 फीसदी और तमिलनाडु में 11.55 फीसदी नाम हटाए गए हैं। वहीं, केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे ज्यादा 16.86 फीसदी की गिरावट देखी गई है। बिहार में पहले चरण के दौरान करीब 6 फीसदी नाम हटाए गए थे।

संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। यहां मतदाताओं की संख्या 15.44 करोड़ से घटकर 13.39 करोड़ रह गई, यानी 2 करोड़ से अधिक नाम सूची से हट गए। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चुनाव आयोग ने यूपी को 10 अप्रैल तक अतिरिक्त समय भी दिया था।

चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को देशभर में SIR अभियान चलाने का फैसला लिया था। करीब 20 साल बाद इतने व्यापक स्तर पर वोटर लिस्ट की समीक्षा की गई है। तेजी से हो रहे शहरीकरण और लोगों के पलायन को देखते हुए मतदाता सूची को अपडेट करना जरूरी माना गया।

SIR प्रक्रिया सामान्य पुनरीक्षण (SSR) से अलग है। SSR में जहां पुराने रिकॉर्ड में सुधार किया जाता है, वहीं SIR के तहत पूरी वोटर लिस्ट को नए सिरे से तैयार किया जाता है। इस बार आयोग ने सभी मतदाताओं को एक महीने के भीतर फॉर्म जमा करना अनिवार्य किया था। जो लोग ऐसा नहीं कर पाए, उनके नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटा दिए गए। कुछ मामलों में नागरिकता से जुड़े दस्तावेज भी मांगे गए, जिसे लेकर विवाद भी सामने आया।

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जहां इसे ‘पीछे के रास्ते से नागरिकता जांच’ करार दिया गया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आने वाले समय में अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इस प्रक्रिया को लागू किया जाएगा।