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Form-6 में ऐसा क्या बदला कि मच गया घमासान? समझिए चुनाव आयोग के विवाद की पूरी कहानी
 

 
 नए वोटरों के Form-6 में ऐसा क्या बदला कि मच गया घमासान? 5 किरदारों से समझिए चुनाव आयोग के विवाद की पूरी कहानी
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नई दिल्ली। देशभर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच अब चुनाव आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। एक मीडिया जांच में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में मतदाता सूची, Form-6, ECINet और चुनावी डेटाबेस से जुड़े विभिन्न फैसलों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

हालांकि, चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक मतभेद की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी संस्थागत फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए। ऐसे में एक तरफ मीडिया रिपोर्टों में सामने आई आपत्तियां हैं, तो दूसरी तरफ आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए।

इस पूरे विवाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, आयोग की आईटी व्यवस्था और Form-6 सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।

विवाद की शुरुआत कहां से हुई?

चुनाव आयोग ने जून 2025 में बिहार से SIR की शुरुआत की थी। इसके बाद इसे अलग-अलग चरणों में दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। सितंबर 2026 की शुरुआत तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जारी ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में SIR से पहले की सूची की तुलना में करीब 13.37 करोड़ नाम कम हुए, जो लगभग 14.1 प्रतिशत की कमी थी। हालांकि, ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होना अपने आप में अंतिम रूप से मतदान अधिकार समाप्त होने के समान नहीं है; दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के बाद अंतिम सूची तैयार होती है।

इसी बड़े बदलाव को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं तथा चुनिंदा मतदाताओं के नाम हटाने के आरोप लगाए। आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है।

आयोग के भीतर 14 आपत्तियों का दावा

23 सितंबर को प्रकाशित The Indian Express की एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में आयोग के विभिन्न कदमों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट के मुताबिक ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR की प्रक्रिया से संबंधित थीं।

इसके उलट चुनाव आयोग का पक्ष है कि बहु-सदस्यीय संस्था में अधिकारियों और सदस्यों के बीच सुझाव, टिप्पणियां और विचार-विमर्श सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा SIR समेत अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

Form-6 को लेकर क्यों उठा विवाद?

Form-6 का इस्तेमाल मुख्य रूप से मतदाता सूची में नया नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। विवाद तब बढ़ा जब ECINet पर उपलब्ध Form-6 में SIR से जुड़ी एक अतिरिक्त घोषणा शामिल की गई।

इसमें आवेदक से यह बताने के लिए कहा गया कि उसका नाम पिछले SIR की मतदाता सूची में था, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उसमें मौजूद था, या इनमें से किसी का नाम नहीं था।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने इस बदलाव पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में संधू की आपत्ति को उद्धृत करते हुए बदलाव को “unauthorised” और “illegal” बताया गया। हालांकि संबंधित सेक्शन को औपचारिक रूप से अनिवार्य नहीं लिखा गया था, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार इसका जवाब दिए बिना ऑनलाइन आवेदन आगे जमा नहीं हो पा रहा था।

आपत्तियों का प्रमुख आधार यह बताया गया कि Form-6 वैधानिक नियमों से जुड़ा निर्धारित फॉर्म है और इसमें इस तरह का बदलाव निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बिना नहीं किया जाना चाहिए।

मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण पर भी सवाल

विवाद सिर्फ Form-6 तक सीमित नहीं रहा। रिपोर्टों के मुताबिक आयोग के भीतर मतदाता डेटाबेस के बढ़ते केंद्रीकरण और राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों की डिजिटल सिस्टम तक पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए गए।

संधू और जोशी की कथित आपत्तियों में कहा गया कि मतदाता सूची तैयार करने वाले अधिकारियों को सिस्टम पर पर्याप्त नियंत्रण और पहुंच मिलनी चाहिए। जोशी ने यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट का सुझाव भी दिया था कि मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव केवल अधिकृत अधिकारी ही कर सकें।

गोवा के 97 मतदाताओं का मामला

गोवा से जुड़ा मामला भी इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 97 मतदाताओं को स्थानीय Electoral Registration Officers ने योग्य पाया था, लेकिन तकनीकी व्यवस्था में उन्हें अंतिम मतदाता सूची में जोड़ने का विकल्प उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके नाम शामिल नहीं हो पाए।

इस मामले को विपक्ष ने चुनाव आयोग की केंद्रीकृत डिजिटल व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया है। हालांकि यह मामला फिलहाल मुख्य रूप से प्रकाशित रिपोर्टों और उससे उपजे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में सामने आया है।

पश्चिम बंगाल में लाखों अपीलें

पश्चिम बंगाल में SIR के बाद मतदाता सूची को लेकर बड़े पैमाने पर अपीलें दाखिल हुईं। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि करीब 38.31 लाख अपीलें दाखिल हुई थीं। इनमें लगभग 22.21 लाख नाम शामिल कराने से संबंधित और करीब 16.10 लाख अतिरिक्त नाम हटाने से संबंधित अपीलें थीं।

इस आंकड़े को लेकर भी सवाल उठे कि जिन मतदाताओं से जुड़े मामलों पर पहले निर्णय हो चुका था, उनके खिलाफ आगे अपील की प्रक्रिया किस आधार पर अपनाई गई। चुनाव आयोग ने अदालत में अपनी प्रक्रिया और SIR के तहत की गई कार्रवाई का बचाव किया है।

इस विवाद के प्रमुख चेहरे

इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सबसे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं। विपक्षी दल SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर उनसे जवाब मांग रहे हैं और कुछ विपक्षी नेताओं ने उनके इस्तीफे की मांग भी की है। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि SIR और अन्य महत्वपूर्ण संस्थागत निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।

दूसरे प्रमुख चेहरे चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने SIR, Form-6 और चुनाव आयोग के आईटी सिस्टम से संबंधित कई मामलों में लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं।

तीसरे अहम किरदार चुनाव आयुक्त विवेक जोशी हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने भी Form-6 में बदलाव और मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण समेत विभिन्न मुद्दों पर सवाल उठाए तथा आईटी सिस्टम के ऑडिट की जरूरत बताई।

इसके अलावा आयोग की आईटी व्यवस्था और ECINet से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी भी विवाद के केंद्र में हैं, क्योंकि कई कथित आपत्तियां इस सवाल से संबंधित हैं कि मतदाता डेटाबेस को नियंत्रित करने और उसमें बदलाव करने का अधिकार किस स्तर के अधिकारी के पास होना चाहिए।

रिपोर्टों के मुताबिक, संधू और जोशी ने आईटी सिस्टम से संबंधित कुछ बदलावों को लेकर कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन से भी अलग-अलग संपर्क किया था।

आखिर Form-6 है क्या?

Form-6 भारतीय नागरिकों के लिए मतदाता सूची में नया नाम दर्ज कराने का प्रमुख आवेदन पत्र है। आमतौर पर पहली बार मतदाता बनने वाले या किसी निर्वाचन क्षेत्र में नए पंजीकरण के पात्र नागरिक इसका इस्तेमाल करते हैं।

इसे ऑनलाइन चुनाव आयोग की डिजिटल सेवाओं के जरिए या ऑफलाइन संबंधित चुनाव अधिकारियों के माध्यम से जमा किया जा सकता है।

मौजूदा विवाद का केंद्र Form-6 का मूल उद्देश्य नहीं, बल्कि ECINet पर इसमें जोड़ी गई SIR से संबंधित अतिरिक्त घोषणा है। रिपोर्ट के मुताबिक आयोग के दो सदस्यों ने इसी बदलाव की वैधानिकता और प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे।

आगे क्या?

SIR को लेकर राजनीतिक लड़ाई अब सिर्फ विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। Form-6 में बदलाव, ECINet की कार्यप्रणाली, मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण और आयोग के भीतर दर्ज कथित आपत्तियों ने बहस को नया आयाम दिया है।

एक तरफ प्रकाशित दस्तावेजों और रिपोर्टों के आधार पर यह सामने आया है कि दो चुनाव आयुक्तों ने विभिन्न मौकों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं। दूसरी तरफ चुनाव आयोग का स्पष्ट पक्ष है कि आंतरिक चर्चा को संस्थागत मतभेद नहीं माना जाना चाहिए और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।