ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी क्यों? सोनिया गांधी का बड़ा सवाल
सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की कथित हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी को विदेश नीति की विश्वसनीयता पर सवाल बताते हुए आलोचना की। उन्होंने संसद में इस मुद्दे पर खुली बहस की मांग की और भारत की पारंपरिक कूटनीतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना पर जोर दिया।
Sonia Gandhi Statement on Khamenei Assassination: कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की कथित लक्षित हत्या पर केंद्र सरकार की चुप्पी को लेकर तीखा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि यह मौन तटस्थता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से विमुख होना है, जिससे भारत की विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा होता है।
अपने लेख में सोनिया गांधी ने कहा कि किसी संप्रभु राष्ट्र के प्रमुख की बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के हत्या अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने न तो इस घटना की स्पष्ट निंदा की और न ही ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर ठोस प्रतिक्रिया दी।
सोनिया गांधी ने कहा, ऐसी घटनाओं पर स्पष्ट और सिद्धांत आधारित रुख न अपनाना वैश्विक मानकों के क्षरण को सामान्य बनाने जैसा है।
संसद में खुली बहस की मांग
सोनिया गांधी ने मांग की कि जब संसद का बजट सत्र दोबारा शुरू हो, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में आए इस “गंभीर व्यवधान” और भारत की प्रतिक्रिया पर खुली और स्पष्ट बहस होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को अपनी नैतिक शक्ति को पुनः खोजने और उसे प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त करने की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा पर भी सवाल
लेख में उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि घटना से 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजराइल यात्रा से लौटे थे, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के प्रति समर्थन दोहराया था। गांधी ने कहा कि ऐसे समय में जब वैश्विक दक्षिण और ब्रिक्स देशों के कई सदस्य संयम बरत रहे हैं, भारत का स्पष्ट राजनीतिक समर्थन चिंताजनक संकेत देता है।
कांग्रेस का रुख और ऐतिहासिक संदर्भ
कांग्रेस ने ईरान में बमबारी और लक्षित हत्याओं की निंदा करते हुए इसे क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा बताया है। गांधी ने कहा कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों पर आधारित रही है। उन्होंने 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपाई की तेहरान यात्रा का उल्लेख करते हुए भारत-ईरान संबंधों की गहराई की याद दिलाई।
