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राहुल गांधी का नाम लिए बिना अमित शाह का संसद में बड़ा आरोप, बोले- जब डोकलाम के समय भारत और चीन की सेनाएं...

 
Amit
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नई दिल्ली। लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हो गया। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में विपक्ष पर जमकर निशाना साधा और चीन को लेकर लगाए गए आरोपों पर भी जवाब दिया।

अमित शाह ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का नाम लिए बिना कहा कि जब डोकलाम के समय भारत और चीन की सेनाएं आमने-सामने थीं, तब विपक्ष के एक बड़े नेता चीन के दूतावास में गुप्त बैठक कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय विपक्ष के एक रक्षा मंत्री ने संसद में यह बयान दिया था कि यदि सीमा पर सड़क बनाई जाएगी तो दुश्मन अंदर आ जाएगा।

कांग्रेस के समय अक्साई चीन पर कब्जा हुआ

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में ही अक्साई चीन पर कब्जा हो गया था। उन्होंने कहा कि उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि वहां घास का तिनका भी नहीं उगता।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि वर्ष 2005-06 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीनी दूतावास से 1 करोड़ 35 लाख रुपये का दान मिला था। शाह ने कहा कि इस मामले में एफसीआरए लाइसेंस भी रद्द किया गया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ किए गए एमओयू में क्या समझौता हुआ था।

बोलने के समय विदेश चले जाते हैं

अमित शाह ने राहुल गांधी के उस आरोप का भी जवाब दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जाता। शाह ने कहा कि जब बोलने का समय आता है तो विपक्ष के नेता विदेश में होते हैं।

उन्होंने बताया कि 17वीं लोकसभा में कांग्रेस के 52 सांसदों को कुल 157 घंटे 55 मिनट बोलने का समय मिला था, जबकि बीजेपी के 303 सांसदों को 349 घंटे 8 मिनट का समय दिया गया।

शाह ने यह भी कहा कि 18वीं लोकसभा में अब तक कांग्रेस को 71 घंटे बोलने का अवसर मिला है, जबकि उनके 99 सदस्य हैं। वहीं बीजेपी को 122 घंटे का समय मिला है, जबकि पार्टी के 239 सांसद हैं। उनके अनुसार इस हिसाब से कांग्रेस को भाजपा की तुलना में अधिक समय मिला है।

स्पीकर की निष्ठा पर सवाल उठाना गलत

गृह मंत्री ने कहा कि जब वर्तमान स्पीकर का चयन हुआ था, तब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने मिलकर उन्हें आसन तक पहुंचाया था। इसलिए स्पीकर के निर्णयों पर असहमति जताई जा सकती है, लेकिन उनकी निष्ठा पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि लोकसभा के नियमों के अनुसार स्पीकर का निर्णय अंतिम माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद विपक्ष द्वारा स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठाया जा रहा है, जो संसदीय परंपराओं के खिलाफ है।