Rahul Gandhi Protest Strategy: शाम को ही क्यों शुरू होते हैं प्रदर्शन? जानिए कांग्रेस की नई रणनीति
राहुल गांधी के दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन का समय चर्चा में है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रियंका गांधी से बातचीत, टीम के साथ बैठक और विपक्षी दलों से तालमेल के बाद कार्यक्रमों की तैयारी होती है। जानिए कांग्रेस की नई सड़क पर सियासत और शाम के प्राइम टाइम से जुड़ा पूरा गणित।
नई दिल्ली: कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के विरोध-प्रदर्शनों का अंदाज बदलता नजर आ रहा है। दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से लेकर प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने तक, राहुल गांधी के कई प्रदर्शन दोपहर बाद शुरू हुए और शाम तक चले। इन कार्यक्रमों के समय और आयोजन के तरीके को लेकर चर्चा है कि कांग्रेस अब सड़क पर विरोध के जरिए शाम के प्राइम टाइम और सोशल मीडिया में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने पर अधिक ध्यान दे रही है।
इंडिया टुडे की 18 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी की राजनीतिक गतिविधियों के पीछे दिनभर की तैयारी, अपनी टीम के साथ बैठकें, प्रियंका गांधी वाड्रा से बातचीत और विपक्षी दलों के साथ तालमेल की भूमिका रहती है।
प्रियंका गांधी से बातचीत के बाद शुरू होती है दिन की तैयारी
रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी दिन की शुरुआत अपनी बहन और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से बातचीत के साथ करते हैं। इसके बाद वह अपनी करीबी टीम के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दिन के कार्यक्रम, राजनीतिक संदेश और आयोजन से जुड़े पहलुओं पर चर्चा करते हैं।
जरूरत के मुताबिक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। जब इंडिया गठबंधन के साझा कार्यक्रम की योजना होती है, तब राहुल गांधी सहयोगी दलों के नेताओं से खुद संपर्क करते हैं।
इस व्यवस्था में प्रदर्शन स्थल पर राहुल गांधी के पहुंचने से पहले ही भीड़ जुटाने, कार्यक्रम की तैयारी और आयोजन से जुड़ी व्यवस्थाओं पर काम शुरू हो जाता है।
दोपहर बाद प्रदर्शन, शाम तक राजनीतिक चर्चा
रिपोर्ट में बताया गया है कि जुलाई से अक्टूबर के बीच दिल्ली में राहुल गांधी ने कम से कम पांच ऐसे प्रदर्शनों का नेतृत्व किया, जो दोपहर बाद शुरू हुए। इनमें कुछ प्रदर्शन शाम तक जारी रहे।
21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर धरना दिया था। यह प्रदर्शन छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर हुआ था। बाद में पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य नेताओं को हिरासत में लिया था।
इसके बाद 21 अगस्त को राहुल गांधी ने संसद मार्ग थाने के बाहर धरना देकर छात्र साहिल लोछब की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। छात्र को जुलाई में हुए प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से चोट लगने का आरोप था।
सितंबर के आखिरी दिनों और अक्टूबर में विरोध का केंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) का मुद्दा बना। 6 अक्टूबर को राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन के सांसदों के साथ चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर मार्च किया। पुलिस बैरिकेडिंग के बाद नेताओं ने धरना दिया, जो शाम तक चला।
प्राइम टाइम में मुद्दे को चर्चा में रखने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, विरोध-प्रदर्शन का समय मीडिया कवरेज और राजनीतिक संदेश के प्रसार में अहम भूमिका निभा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा कि टेलीविजन और सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक कार्यक्रमों का समय मायने रखता है।
दोपहर बाद शुरू होने वाले प्रदर्शन में पार्टी को कार्यकर्ताओं को जुटाने और आयोजन की तैयारी के लिए समय मिलता है। वहीं, शाम तक चलने वाले कार्यक्रमों की तस्वीरें और वीडियो टीवी बहसों, डिजिटल खबरों और सोशल मीडिया पर चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं।
रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने भी कांग्रेस की संचार रणनीति में बदलाव की ओर इशारा किया। उनके मुताबिक, पार्टी पहले की संचार संबंधी गलतियों से सीखते हुए अपनी बात पहुंचाने के तरीके में सुधार कर रही है।
हालांकि, प्रदर्शन के समय को लेकर पार्टी की रणनीति के बारे में सामने आए ये आकलन रिपोर्ट में शामिल पत्रकारों और विश्लेषकों की राय पर आधारित हैं।
संसद से सड़क तक विरोध का बदला तरीका
पहले दिल्ली में विपक्ष के कई बड़े प्रदर्शन संसद की कार्यवाही के समय के आसपास होते थे। ऐसे कार्यक्रमों की तस्वीरें अक्सर संसद परिसर और दिन के समाचार बुलेटिन तक सीमित रह जाती थीं। अब सड़क पर धरने, पुलिस बैरिकेडिंग और नेताओं के बीच टकराव के दृश्य शाम की खबरों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लंबे समय तक बने रहते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी की हालिया राजनीतिक गतिविधियों में विरोध के मुद्दे के साथ-साथ कार्यक्रम की प्रस्तुति और दृश्य प्रभाव पर भी ध्यान दिया जा रहा है। उनकी टीम कार्यक्रमों के आयोजन और संदेश को व्यवस्थित करने में भूमिका निभाती है।
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन बना ताजा उदाहरण
अक्टूबर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेताओं ने कई प्रदर्शन किए। विपक्ष ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों को लेकर चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ पक्ष का रुख भी राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है।
राहुल गांधी की रणनीति पर आई रिपोर्ट का प्रमुख निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस अब विरोध-प्रदर्शनों के आयोजन, समय और संदेश के प्रसार को अधिक व्यवस्थित तरीके से साधने की कोशिश कर रही है। इसका उद्देश्य केवल मौके पर विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि उस मुद्दे को शाम की राजनीतिक चर्चा और अगले दिन की खबरों तक बनाए रखना भी है।
