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6 साल बाद बना दुर्लभ संयोग, इस बार वट सावित्री व्रत पर रहेगा शनि अमावस्या का प्रभाव

वट सावित्री व्रत 2026 इस बार खास संयोगों के साथ मनाया जाएगा। 16 मई को शनि अमावस्या, शोभन योग और सर्वार्थ सिद्धि योग एक साथ पड़ रहे हैं। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और अखंड सौभाग्य के लिए वटवृक्ष की पूजा करेंगी। जानें पूजा मुहूर्त और धार्मिक महत्व।

 
वट सावित्री व्रत
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ज्येष्ठ मास की अमावस्या पर मनाया जाने वाला वट सावित्री व्रत इस वर्ष बेहद खास संयोगों में पड़ रहा है। 16 मई को सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ व्रत रखेंगी। खास बात यह है कि इस बार वट सावित्री व्रत छह साल बाद शनि अमावस्या के दुर्लभ संयोग में मनाया जाएगा। इसके साथ ही शोभन योग और सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहे हैं, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।


वटवृक्ष की पूजा कर करेंगी सुख-समृद्धि की कामना

व्रत के दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर वटवृक्ष की पूजा करेंगी। पूजा के दौरान धूप, दीप, रोली, अक्षत और जल अर्पित किया जाएगा। महिलाएं वटवृक्ष पर कलावा बांधकर सात या 108 बार परिक्रमा करेंगी और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करेंगी। श्रद्धालु महिलाएं “नमो वैवस्वताय” मंत्र का जाप करते हुए सावित्री को अर्घ्य देंगी। मान्यता है कि इस व्रत और पूजा से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और पति की आयु लंबी होती है।

शनि अमावस्या से बढ़ा धार्मिक महत्व

वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य प्रो. नागेंद्र पांडेय के अनुसार, अमावस्या तिथि 16 मई को तड़के 3:51 बजे शुरू होकर देर रात 1:38 बजे तक रहेगी। शनिवार होने की वजह से इस दिन शनि अमावस्या भी मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनि अमावस्या पर पूजा और दान का विशेष महत्व होता है।
उन्होंने बताया कि वटवृक्ष की पूजा और सती सावित्री की कथा सुनने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

तीन दिन तक चलेगा व्रत अनुष्ठान

कई महिलाएं इस व्रत को तीन दिवसीय अनुष्ठान के रूप में भी करती हैं। इसकी शुरुआत ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी यानी 14 मई से होगी और 16 मई को अमावस्या पर इसका समापन होगा। अधिकांश महिलाएं अमावस्या के दिन निर्जला या पूर्ण उपवास रखेंगी और अगले दिन प्रतिपदा तिथि पर पारण करेंगी।

सौभाग्य पिटारी और दान की परंपरा

व्रत के अवसर पर महिलाएं सौभाग्य पिटारी और बांस की टोकरी में पूजा सामग्री सजाकर सास का आशीर्वाद लेंगी। इसके साथ ही ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने की परंपरा भी निभाई जाएगी।

पूजा के प्रमुख शुभ मुहूर्त

  • प्रातःकाल पूजा मुहूर्त: सुबह 7:15 बजे से 10:45 बजे तक
  • अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:50 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक
  • गोधूलि मुहूर्त: शाम 7:04 बजे से 7:27 बजे तक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शुभ मुहूर्त में पूजा करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है।