Dev Deepawali : काशी की देव दीपावली का महादेव से है सीधा कनेक्शन, जानें कैसे शुरु हुई इसे मनाने की परंपरा
Nov 3, 2025, 20:31 IST
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वाराणसी। इस साल कार्तिक पूर्णिमा का शुभ दिन 5 नवंबर बुधवार को पड़ रहा है। सनातन धर्म में इस तिथि का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दिन भगवान शिव की नगरी काशी में देव दीपावली (Dev Deepawali) का भव्य उत्सव मनाया जाता है। कहते है कि इस दिन सभी देवी-देवता स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं और गंगा स्नान कर दीपोत्सव के साक्षी बनते है। क्या आप जानते है कि देव दीपावली (Dev Deepawali) का सीधा संबंध भगवान शिव से है। आइए आपको इससे जुड़ी पौराणिक कथा और महत्व के बारे में बताते है।
देव दीपावली का महत्व
दिवाली के ठीक 15 दिन बाद आने वाला यह पर्व न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आध्यात्मिक आस्था और सांस्कृतिक सुंदरता का प्रतीक भी है। कहा जाता है कि इस दिन गंगा घाटों पर स्वयं देवताओं का वास होता है। इसी कारण देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचते हैं ताकि इस दिव्य नजारे के साक्षी बन सकें।
भगवान शिव को समर्पित है पर्व
देव दीपावली को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह पर्व भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन वाराणसी के 84 घाट दीपों की अनगिनत लौ से जगमग हो उठते हैं। शाम के समय पारंपरिक गंगा आरती का भव्य आयोजन होता है, जिसमें हजारों भक्त दीप जलाकर घाटों को आलोकित करते हैं। वहीं घरों में भी दीये, रंगोली और पुष्प सजावट से वातावरण को पावन बना दिया जाता है।
देव दीपावली से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने अपने पिता की सहायता से राक्षस तारकासुर का वध किया था। उसके तीन पुत्रों ने बदला लेने के लिए कठोर तप किया और ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि उनकी मृत्यु तभी संभव हो जब अभिजीत नक्षत्र में उनके तीनों नगर एक सीध में आएं और कोई शांत पुरुष असंभव रथ व अस्त्र से वार करे।
इस वरदान के कारण वे अजेय बन गए और तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगे। तब देवताओं ने महादेव से उन्हें मारने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने सूर्य और चंद्रमा के पहियों वाले रथ पर सवार होकर कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर का अंत किया।
इस विजय के उपलक्ष्य में देवताओं ने काशी नगरी में दीप प्रज्वलित कर उत्सव मनाया। तभी से इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।
दीपावली और देव दीपावली में अंतर
दीपावली और देव दीपावली दोनों ही अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक हैं। जहां दीपावली भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय की स्मृति में मनाई जाती है, वहीं देव दीपावली भगवान महेश्वर की त्रिपुरासुर पर विजय का उत्सव है।
काशी में इस दिन का विशेष महत्व है। पूरी नगरी दीपों की रोशनी से नहाई होती है, गंगा आरती की गूंज वातावरण को पवित्र बना देती है और हर तरफ “हर हर महादेव” के जयघोष गूंजते हैं।
देव दीपावली का महत्व
दिवाली के ठीक 15 दिन बाद आने वाला यह पर्व न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आध्यात्मिक आस्था और सांस्कृतिक सुंदरता का प्रतीक भी है। कहा जाता है कि इस दिन गंगा घाटों पर स्वयं देवताओं का वास होता है। इसी कारण देश और विदेश से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक काशी पहुंचते हैं ताकि इस दिव्य नजारे के साक्षी बन सकें।
भगवान शिव को समर्पित है पर्व
देव दीपावली को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह पर्व भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन वाराणसी के 84 घाट दीपों की अनगिनत लौ से जगमग हो उठते हैं। शाम के समय पारंपरिक गंगा आरती का भव्य आयोजन होता है, जिसमें हजारों भक्त दीप जलाकर घाटों को आलोकित करते हैं। वहीं घरों में भी दीये, रंगोली और पुष्प सजावट से वातावरण को पावन बना दिया जाता है।
देव दीपावली से जुड़ी पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने अपने पिता की सहायता से राक्षस तारकासुर का वध किया था। उसके तीन पुत्रों ने बदला लेने के लिए कठोर तप किया और ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि उनकी मृत्यु तभी संभव हो जब अभिजीत नक्षत्र में उनके तीनों नगर एक सीध में आएं और कोई शांत पुरुष असंभव रथ व अस्त्र से वार करे।
इस वरदान के कारण वे अजेय बन गए और तीनों लोकों में आतंक फैलाने लगे। तब देवताओं ने महादेव से उन्हें मारने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने सूर्य और चंद्रमा के पहियों वाले रथ पर सवार होकर कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर का अंत किया।
इस विजय के उपलक्ष्य में देवताओं ने काशी नगरी में दीप प्रज्वलित कर उत्सव मनाया। तभी से इस दिन को देव दीपावली के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।
दीपावली और देव दीपावली में अंतर
दीपावली और देव दीपावली दोनों ही अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक हैं। जहां दीपावली भगवान श्रीकृष्ण की नरकासुर पर विजय की स्मृति में मनाई जाती है, वहीं देव दीपावली भगवान महेश्वर की त्रिपुरासुर पर विजय का उत्सव है।
काशी में इस दिन का विशेष महत्व है। पूरी नगरी दीपों की रोशनी से नहाई होती है, गंगा आरती की गूंज वातावरण को पवित्र बना देती है और हर तरफ “हर हर महादेव” के जयघोष गूंजते हैं।
