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Holi 2026: राजा दिवोदास और भगवान शिव की कथा से जुड़ी है काशी की होली, चौसठ्ठी देवी का क्या है रहस्य?

 
Chausathi Devi Temple varanasi
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वाराणसी। रंगों के पर्व होली पर जहां पूरा देश उत्सव में डूबा है, वहीं महादेव की नगरी वाराणसी में इस त्योहार की अपनी अलग ही परंपरा है। यहां होली का रंग तभी पूर्ण माना जाता है, जब मां चौसठ्ठी देवी (Chausathi Devi Temple Varanasi) के चरणों में पहला गुलाल अर्पित किया जाता है। यह परंपरा करीब 503 वर्षों से चली आ रही है।

मान्यता है कि दिन भर रंग-गुलाल खेलने के बाद काशीवासी मुट्ठी भर अबीर-गुलाल लेकर मां चौसठ्ठी के दरबार में पहुंचते हैं और उनके चरणों में अर्पित कर तंत्र की देवी से मुक्ति व कल्याण की कामना करते हैं।

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काशी में यहां स्थित है देवी का मंदिर

दशाश्वमेध घाट के समीप स्थित मां चौसठ्ठी देवी का मंदिर होली की शाम को पूरी तरह गुलाल और अबीर के रंग में रंग जाता है। पांच शताब्दियों से अधिक समय से काशी में यह परंपरा चली आ रही है कि धूलिवंदन के साथ देवी दरबार में गुलाल अर्पित कर ही रंगोत्सव की पूर्णता मानी जाती है।

पौराणिक मान्यता क्या कहती है?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब काशी के राजा दिवोदास ने अपना प्रभाव स्थापित कर भगवान शिव को काशी से बाहर भेज दिया था, तब पुनः काशी में प्रवेश के लिए भगवान शिव ने कैलाश से अष्ट भैरव और छप्पन विनायकों को भेजा। इसके बाद 64 योगिनियां काशी पहुंचीं।

जब भगवान शिव दोबारा काशी लौटे, तो उन्हीं की कृपा से ये 64 योगिनियां ‘चौसठ्ठी देवी’ के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। चौसठ्ठी देवी का सिद्धपीठ तंत्र साधना के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

श्री काशी विद्वत कर्मकांड परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी के अनुसार, चौसठ्ठी देवी के चरणों में गुलाल अर्पित किए बिना काशी में होली का उत्सव अधूरा माना जाता है। पहले शहर ही नहीं, आसपास के गांवों से भी लोग गाजे-बाजे के साथ देवी यात्रा निकालते थे। समय के साथ यात्रा सीमित जरूर हुई है, लेकिन परंपरा आज भी अटूट है।

चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन ही चौसठ्ठी देवी ने काशी में अपना स्थान ग्रहण किया था। काशी खंड में चौंसठ योगिनियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। चौसठ्ठी घाट स्थित मंदिर में देवी के साथ काल भैरव, एकदंत विनायक और भद्र काली भी विराजमान हैं।

काशी में होली केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का संगम है, जहां हर रंग देवी-देवताओं को समर्पित होकर ही पूर्ण माना जाता है।