मनफेर को परिवार संग नगर भ्रमण पर निकले भगवान जगन्नाथ, कल से होगा तीन दिनी रथयात्रा मेले का आगाज...
वाराणसी। काशी का विश्व प्रसिद्ध लक्खा मेला रथयात्रा गुरुवार, 16 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। उससे पहले बुधवार को भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य डोली यात्रा पर निकले। मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान 15 दिनों तक अस्वस्थ रहने के कारण विश्राम करते हैं। स्वास्थ्य लाभ के बाद वे नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं, जिसे देखने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए हजारों श्रद्धालु सड़कों पर उमड़ पड़े।
अस्सी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर से जैसे ही भगवान की डोली निकली, पूरा मार्ग "जय जगन्नाथ" के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने पूरे रास्ते पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत किया। डोली अस्सी चौराहा, पद्मश्री चौराहा, दुर्गाकुंड, नवाबगंज, खोजवां बाजार, शंकुलधारा पोखरा और बैजनत्था होते हुए रथयात्रा स्थित बेनीराम बाग पहुंची, जहां भगवान के विग्रह को रथ पर विराजमान कराया गया। इसी के साथ गुरुवार से तीन दिवसीय रथयात्रा मेले का शुभारंभ होगा।
15 दिनों तक चला स्वास्थ्य लाभ का अनुष्ठान
अस्सी जगन्नाथ मंदिर के महंत पंडित राजेश पांडेय ने बताया कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान के महाअभिषेक और स्नान के बाद उन्हें अस्वस्थ माना जाता है। इस दौरान भगवान 15 दिनों तक अज्ञातवास में रहते हैं। इस अवधि में उन्हें औषधीय काढ़ा, परवल का रस और 56 प्रकार के विशेष भोग अर्पित किए जाते हैं। यही प्रसाद श्रद्धालुओं में भी वितरित किया जाता है। स्वास्थ्य लाभ के बाद भगवान नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं।
स्वास्थ्य लाभ के बाद अपनी मौसी के घर भ्रमण को जाते है प्रभु
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ स्वास्थ्य लाभ के बाद अपनी मौसी के घर भ्रमण के लिए जाते हैं। काशी में इस परंपरा को भगवान के ससुराल आगमन के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से हर वर्ष डोली यात्रा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निकाली जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
दर्शन मात्र से पूरी होती हैं मनोकामनाएं
काशी में भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि उनके दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही कारण है कि रथयात्रा मेले में देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु काशी पहुंचते हैं। इस वर्ष भी भगवान के रथ को पीले फूलों, पताकाओं और आकर्षक सजावट से भव्य रूप दिया गया है।
तीन सदियों पुरानी है यह परंपरा
वाराणसी की रथयात्रा का इतिहास लगभग ढाई से तीन सौ वर्ष पुराना माना जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 1768 में हुई थी। बताया जाता है कि पुरी के एक ब्रह्मचारी पुजारी राजा से मतभेद के बाद काशी आए और अस्सी घाट पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाओं की स्थापना की। बाद में छत्तीसगढ़ के राजा व्यंकोजी भोंसले ने मंदिर निर्माण में सहयोग दिया और मंदिर के संचालन के लिए तखतपुर महाल की आय समर्पित की।
1857 के बाद भी नहीं टूटी परंपरा
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों ने भोंसले राजघराने की संपत्तियां जब्त कर लीं, जिससे मंदिर की आय प्रभावित हुई। इसके बाद मंदिर की देखरेख का दायित्व पंडित बेनीराम और उनके परिवार को सौंपा गया। आज भी उनके वंशज इस ऐतिहासिक परंपरा को पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ निभा रहे हैं। अस्सी घाट पर स्थित ब्रह्मचारीजी की समाधि आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।
