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मकर संक्रांति: लोक संस्कृति, परंपरा और मेरी स्मृतियाँ

 
 मकर संक्रांति: लोक संस्कृति, परंपरा और मेरी स्मृतियाँ
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आलेख-अमित श्रीवास्तव 

भारत के पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, वे लोकजीवन की धड़कनों से जुड़े होते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है, जो आकाशीय परिवर्तन, ऋतुचक्र, कृषि-संस्कृति और मानवीय संबंधों को एक साथ जोड़ता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही जब उत्तरायण का आरंभ होता है, तब भारतीय जनमानस इसे नई ऊर्जा, नई फसल और नई आशा के प्रतीक के रूप में स्वीकार करता है। यह पर्व विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-ग्रामीण समाज में जीवन के उत्सव की तरह मनाया जाता है।

दही-चूड़ा-गुड़: लोक बुद्धि का स्वाद 

मकर संक्रांति की पहचान दही-चूड़ा-गुड़ से होती है। यह भोजन जितना सरल है, उतना ही वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से गहरा। चूड़ा नई फसल का प्रतीक है, दही शीत ऋतु में पाचन को संतुलित रखता है और गुड़ शरीर को ऊष्मा देता है। यह थाली लोकजीवन की उस समझ को दर्शाती है, जिसमें स्वाद, स्वास्थ्य और मौसम—तीनों का संतुलन है। 

तिलकुट, बालूशाही और लड्डू: मिठास का सामाजिक अर्थ 

मकर संक्रांति की मिठास केवल स्वाद तक सीमित नहीं रहती। तिलकुट, बालूशाही और लड्डू सामाजिक रिश्तों को मधुर करने का माध्यम बनते हैं। तिलकुट—जो तिल और गुड़ से बनता है। ठंड में तिल की ऊष्मा और गुड़ की मिठास जैसे आपसी रिश्तों में गर्माहट भर देती है। वाराणसी, के बाजारों में इन दिनों तिलकुट की दुकानों पर जो चहल-पहल होती है, वह अपने आप में एक लोकदृश्य है। मिठाइयाँ केवल खाने के लिए नहीं खरीदी जातीं, बल्कि बाँटने के लिए ली जाती हैं—पड़ोसी, रिश्तेदार और अतिथि सभी इस मिठास के हिस्सेदार बनते हैं।

मकर संक्रांति और लोकजीवन का नैतिक पक्ष 

मकर संक्रांति दान और संवेदना का पर्व भी है। इस दिन तिल, अन्न, वस्त्र और गरम कपड़े दान करने की परंपरा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि समृद्धि का वास्तविक मूल्य संग्रह में नहीं, बल्कि वितरण में है। गाँवों में यह ध्यान रखा जाता है कि कोई भूखा न रहे। यह पर्व श्रम का सम्मान करता है—किसान की फसल, कारीगर की कला और मजदूर की मेहनत—सबका उत्सव है मकर संक्रांति।

मेरी दृष्टि में मकर संक्रांति 

आज जब जीवन शहरों, समय-सारिणी और डिजिटल दुनिया में बंधता जा रहा है,  मेरे लिए मकर संक्रांति यह याद दिलाती है कि आधुनिकता की दौड़ में भी अगर हम अपनी लोकसंस्कृति, परंपरा और संवेदना को बचाए रखें, तो समाज मानवीय बना रह सकता है। मकर संक्रांति आत्मा का पर्व है। यह पर्व हमें प्रकृति, परंपरा और मानवता के साथ सामंजस्य सिखाता है।

जड़ें जितनी गहरी होंगी, जीवन उतना ही स्थिर और अर्थपूर्ण होगा।मेरे लिए यह पर्व हर वर्ष एक ही संदेश देता है—